स्वयं का होना
अभी अधूरा अधूरा हैं
सरिता बहाव चाहती
उबड खाबड चढ़ान
बहे तो कैसे
झाकता ताकता हूँ
खुले आकाश मे
प्रचण्ड सूर्य रश्मिया
चुभती हैं
विवश थके अरमानो सा मेरा
समूचा अस्तित्व
फिर एक बार झुकता जमी की ओर
ओर पाता हूँ
वहीं ऊबड खाबड चढान
मेरी जीवन सरिता
ठगी सी
रूकी रूकी हैं
लगता ऐसा कि
मैं नहीं हूँ
फिर भी हूँ ।
छगनलाल गर्ग।
अभी अधूरा अधूरा हैं
सरिता बहाव चाहती
उबड खाबड चढ़ान
बहे तो कैसे
झाकता ताकता हूँ
खुले आकाश मे
प्रचण्ड सूर्य रश्मिया
चुभती हैं
विवश थके अरमानो सा मेरा
समूचा अस्तित्व
फिर एक बार झुकता जमी की ओर
ओर पाता हूँ
वहीं ऊबड खाबड चढान
मेरी जीवन सरिता
ठगी सी
रूकी रूकी हैं
लगता ऐसा कि
मैं नहीं हूँ
फिर भी हूँ ।
छगनलाल गर्ग।