Sunday, June 12, 2016

मन मेरे

मन मेरे 
घने बन चुके 
महत्वाकांक्षी 
वशीभूत हो लोभ से
अहंकार से
ओर चाहो अकारण आनन्द
यह कैसे हो
पाने की दौड 
मेरे लोभ खूब हुई ओर
पाया हूँ घना अहंकार 
समझ बेठा हूँ 
महल पुत्र पत्नी को भी
खुद के सजावट की वस्तु 
कि मेरा अहंकार 
ढिढोरा पीटे 
अपनी वर्चस्वता का
यही जीवन शैली मेरी
पर भीतर 
प्रेम स्त्रोत रीता हैं 
महत्वाकांक्षा रहते भरेगा क्या 
सम्भावना नहीं 
सहज आनन्द भाव 
स्नेह मिले 
चाहता हूँ 
वह क्षण हैं कहां 
कि
कुछ माँगना कुछ कहना
बस मिले घड़ी भर
प्रेम तेरा सानिध्य 
स्वाद मीठा सा
जिसमें लेन देन नहीं 
जहाँ प्रेम प्रार्थना मे
रूपान्तरित होता हो
ओर मंदिर 
खुद की देह 
अनुभूति मे रहती हो।
छगनलाल गर्ग।