मन मेरे
घने बन चुके
महत्वाकांक्षी
वशीभूत हो लोभ से
अहंकार से
ओर चाहो अकारण आनन्द
यह कैसे हो
पाने की दौड
मेरे लोभ खूब हुई ओर
पाया हूँ घना अहंकार
समझ बेठा हूँ
महल पुत्र पत्नी को भी
खुद के सजावट की वस्तु
कि मेरा अहंकार
ढिढोरा पीटे
अपनी वर्चस्वता का
यही जीवन शैली मेरी
पर भीतर
प्रेम स्त्रोत रीता हैं
महत्वाकांक्षा रहते भरेगा क्या
सम्भावना नहीं
सहज आनन्द भाव
स्नेह मिले
चाहता हूँ
वह क्षण हैं कहां
कि
न कुछ माँगना न कुछ कहना
बस मिले घड़ी भर
प्रेम तेरा सानिध्य
स्वाद मीठा सा
जिसमें लेन देन नहीं
जहाँ प्रेम प्रार्थना मे
रूपान्तरित होता हो
ओर मंदिर
खुद की देह
अनुभूति मे रहती हो।
छगनलाल गर्ग।
घने बन चुके
महत्वाकांक्षी
वशीभूत हो लोभ से
अहंकार से
ओर चाहो अकारण आनन्द
यह कैसे हो
पाने की दौड
मेरे लोभ खूब हुई ओर
पाया हूँ घना अहंकार
समझ बेठा हूँ
महल पुत्र पत्नी को भी
खुद के सजावट की वस्तु
कि मेरा अहंकार
ढिढोरा पीटे
अपनी वर्चस्वता का
यही जीवन शैली मेरी
पर भीतर
प्रेम स्त्रोत रीता हैं
महत्वाकांक्षा रहते भरेगा क्या
सम्भावना नहीं
सहज आनन्द भाव
स्नेह मिले
चाहता हूँ
वह क्षण हैं कहां
कि
न कुछ माँगना न कुछ कहना
बस मिले घड़ी भर
प्रेम तेरा सानिध्य
स्वाद मीठा सा
जिसमें लेन देन नहीं
जहाँ प्रेम प्रार्थना मे
रूपान्तरित होता हो
ओर मंदिर
खुद की देह
अनुभूति मे रहती हो।
छगनलाल गर्ग।