Friday, June 3, 2016

स्वप्न

स्वप्न आने दो
अच्छा लगे भ्रम में वैभव जीये
होने दो यह ठीक से स्वतः
आखिर रस केवल तृष्णा देता
कहां यह तृप्ति का संसार 
कि चाहत संतोष ले
नहीं होने दो बहुत कुछ 
युगो का संचित अब भी
जब होने लगते हो नये 
अधिक बदले से
बन जाते हो मायिक
नहीं पकड पाता मेरा स्व भी 
फिर मुझे 
बड़ी ऊँची कला के बाजीगर 
रूको असीम नहीं हो कि चल सको
रोकेंगे किनारे 
आगे घना गहरा दरिया जहां केवल 
गुम हो जाना अज्ञात मे
हो बिल्कुल आबद्ध 
झकडे समय से
दुकानदार की तरह करते हो 
श्वासो का मोल
तुम्हारा स्वप्न नहीं सत्य 
ठीक जागरण के उजाले सा
दोनों ही दशाऐ एक सी
यह भी तो स्वप्न रात सा
कहां संचित होता अनुभव 
करो केवल इतना भर
देखो ऐसे कि महसूस हो
यह संसार देखने का अनुभव 
बस यही पल
यही टूट जाता स्वप्न ओर संसार 
तब नहीं भाता कोई 
रात या दिन का स्वप्न
छगन लाल गर्ग