करना चाहता हिसाब
अब तक जीया
लगातार दौडता रहा हाँफता रहा
संचित निमित्त
कि पाऊँ पहचान भी
विशिष्टता का वर्चस्व भी
बहुत लंबी रही यह यात्रा
साथी मिले चले साथ बिछुडे भी
नहीं चल सका अंतिम तक साथ
विवशता मेरी भी
उनकी भी
चाह का दायरा बडा छोटा संगत का
मुख्य आधार
पिछड़ा संभलता रेंगता लडखडाता
चला तो हूँ
बेहिसाब कहां पूरे गणित के साथ
पर आज सवाल गलत हल गलत उतर गलत
शायद स्वप्नवत संचित करता रहा
ओर हिसाब वहीं बताता
जो सत्य मे मेरा रहेगा नहीं
पत्नी भी बच्चे भी सब मामला
केवल धारणा का संचय
असलीपन से बिल्कुल खालीपन
अब अंतिम का होश
परिस्थिति वस
हिसाब मिलता नहीं समय चूक गया
ओर फिर पछतावे का सच लेकर
खड़ा हूँ मौन मूक ठगा सा माया मोह
तुम अब तो सौभाग्य दो छोड़ो मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।
अब तक जीया
लगातार दौडता रहा हाँफता रहा
संचित निमित्त
कि पाऊँ पहचान भी
विशिष्टता का वर्चस्व भी
बहुत लंबी रही यह यात्रा
साथी मिले चले साथ बिछुडे भी
नहीं चल सका अंतिम तक साथ
विवशता मेरी भी
उनकी भी
चाह का दायरा बडा छोटा संगत का
मुख्य आधार
पिछड़ा संभलता रेंगता लडखडाता
चला तो हूँ
बेहिसाब कहां पूरे गणित के साथ
पर आज सवाल गलत हल गलत उतर गलत
शायद स्वप्नवत संचित करता रहा
ओर हिसाब वहीं बताता
जो सत्य मे मेरा रहेगा नहीं
पत्नी भी बच्चे भी सब मामला
केवल धारणा का संचय
असलीपन से बिल्कुल खालीपन
अब अंतिम का होश
परिस्थिति वस
हिसाब मिलता नहीं समय चूक गया
ओर फिर पछतावे का सच लेकर
खड़ा हूँ मौन मूक ठगा सा माया मोह
तुम अब तो सौभाग्य दो छोड़ो मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।