रीत रहा अस्तित्व
धीरे धीरे
समय की विषम आँच
पकता जाता
आत्म बल
जलने लगता निस्सार का जमाव
देह गलित हुई जाती
सत्य की प्रस्फूटित होती
रश्मियो की तपन
अब भाने लगी
नहीं करनी अब कोई साधना
कि पाऊँ सत्य
अज्ञान की परते
जलाती रश्मियाँ उघाडती
सत्य
ओर नहीं अब मोक्ष निमित्त भी
साधना की जरूरत
होता रहता हूँ नित्य विरस माया से
देहिक असक्षमता देती शून्य भान
ओर होता जाता प्रति क्षण विरक्त
उपलब्धि का सत्य लेता आकार
निरपेक्ष चित पावन सा
सरित बहने लगता
विचार प्रवाह
ओर होने लगता हूँ आश्वस्त
यही ब्रह्म यही साधना यहीं मोक्ष ।
छगन लाल गर्ग ।
धीरे धीरे
समय की विषम आँच
पकता जाता
आत्म बल
जलने लगता निस्सार का जमाव
देह गलित हुई जाती
सत्य की प्रस्फूटित होती
रश्मियो की तपन
अब भाने लगी
नहीं करनी अब कोई साधना
कि पाऊँ सत्य
अज्ञान की परते
जलाती रश्मियाँ उघाडती
सत्य
ओर नहीं अब मोक्ष निमित्त भी
साधना की जरूरत
होता रहता हूँ नित्य विरस माया से
देहिक असक्षमता देती शून्य भान
ओर होता जाता प्रति क्षण विरक्त
उपलब्धि का सत्य लेता आकार
निरपेक्ष चित पावन सा
सरित बहने लगता
विचार प्रवाह
ओर होने लगता हूँ आश्वस्त
यही ब्रह्म यही साधना यहीं मोक्ष ।
छगन लाल गर्ग ।