Saturday, June 11, 2016

जाने दो अब

जाने दो अब
भर गया मन
बनावटी नेह से
कब तक जीयू 
छलावे की जिन्दगी 
भार बोझिल तन मन 
महक देती आभा तले
कृत्रिम जिन्दगी स्वयं तरसती
असलियत पाने
कब तक छिपाओगे
औकात का पिजरा
बनावट की चटाई नीचे 
उभरता जितना छिपाते
सत्य 
ठीक वैसे जैसे बेमेल कपडो तले
तुम्हारा असली ढाँचा 
छूपा हैं 
कहां गयी तुम्हारी असली हंसी
जो सुनता था
बहुत बार उन्मुक्त वेग उसका
कि निकल पडते 
ऑखो से ऑसू
हर्ष ओर भावना के मिश्रित
आज की हंसी 
वह नहीं मित्र 
खोखली ओर बनावटी
रहने दो मत हसो
समझा हँसने से पहले 
तुम्हारी चित दशा
समपन्न होने का दिखावा
लुभाता नहीं मित्र 
डराता हैं मुझे 
देखता हूँ तिल तिल मरते तुम्हें 
मनुष्य का यह रूप
प्राणों के स्पन्दन रहित
जीता हुआ 
डराता भीतर 
मित्र मेरे यह जीना
नहीं भाता
जाने दो अब
भर गया मन।
छगन लाल गर्ग।