जाने दो अब
भर गया मन
बनावटी नेह से
कब तक जीयू
छलावे की जिन्दगी
भार बोझिल तन मन
महक देती आभा तले
कृत्रिम जिन्दगी स्वयं तरसती
असलियत पाने
कब तक छिपाओगे
औकात का पिजरा
बनावट की चटाई नीचे
उभरता जितना छिपाते
सत्य
ठीक वैसे जैसे बेमेल कपडो तले
तुम्हारा असली ढाँचा
छूपा हैं
कहां गयी तुम्हारी असली हंसी
जो सुनता था
बहुत बार उन्मुक्त वेग उसका
कि निकल पडते
ऑखो से ऑसू
हर्ष ओर भावना के मिश्रित
आज की हंसी
वह नहीं मित्र
खोखली ओर बनावटी
रहने दो मत हसो
समझा हँसने से पहले
तुम्हारी चित दशा
समपन्न होने का दिखावा
लुभाता नहीं मित्र
डराता हैं मुझे
देखता हूँ तिल तिल मरते तुम्हें
मनुष्य का यह रूप
प्राणों के स्पन्दन रहित
जीता हुआ
डराता भीतर
मित्र मेरे यह जीना
नहीं भाता
जाने दो अब
भर गया मन।
छगन लाल गर्ग।
भर गया मन
बनावटी नेह से
कब तक जीयू
छलावे की जिन्दगी
भार बोझिल तन मन
महक देती आभा तले
कृत्रिम जिन्दगी स्वयं तरसती
असलियत पाने
कब तक छिपाओगे
औकात का पिजरा
बनावट की चटाई नीचे
उभरता जितना छिपाते
सत्य
ठीक वैसे जैसे बेमेल कपडो तले
तुम्हारा असली ढाँचा
छूपा हैं
कहां गयी तुम्हारी असली हंसी
जो सुनता था
बहुत बार उन्मुक्त वेग उसका
कि निकल पडते
ऑखो से ऑसू
हर्ष ओर भावना के मिश्रित
आज की हंसी
वह नहीं मित्र
खोखली ओर बनावटी
रहने दो मत हसो
समझा हँसने से पहले
तुम्हारी चित दशा
समपन्न होने का दिखावा
लुभाता नहीं मित्र
डराता हैं मुझे
देखता हूँ तिल तिल मरते तुम्हें
मनुष्य का यह रूप
प्राणों के स्पन्दन रहित
जीता हुआ
डराता भीतर
मित्र मेरे यह जीना
नहीं भाता
जाने दो अब
भर गया मन।
छगन लाल गर्ग।