Saturday, June 11, 2016

सलिका सभ्यता का

क्या हुआ 
नहीं आती दुनिया दारी
सलिका सभ्यता का
दोहराता हूँ बंधे बंधे बोल
बाप दादो से अर्जित 
संयमित जीने के
नकारा हैं तुम्हारे लिए
रोकते हैं तुम्हें 
स्वछन्द आचरण से
ओर होती जाती मेरी उपेक्षा 
स्वीकार्य हैं मुझे 
कहलाता हूँ पिछड़ा शख्स 
क्या हुआ 
अगर मे गलती तुम्हारी
कहता हूँ हित पहचान 
मेरा भी तुम्हारा भी
तुम रचते हो षड्यंत्र 
मेरे अस्तित्व मिटाने का
ओर धुन्ध मे जीने को
होते हो मजबूर 
भ्रमित जिन्दगी पतन की
क्या हुआ 
यदि मैं कहता हूँ 
जिओ खुशबू दार जिन्दगी 
ओर तुम लगाते जाते 
नित नया स्प्रे इत्र
बनावटी ओर बेअसर
कैसे होगा इन्तजाम
नयी मानवता का
अति पुष्ट देखता हूँ भरा भरा
अंहकारी पुतला तुम्हारी
नयी जिन्दगी 
नयी सभ्यता 
ओर नये संस्कारों का
कि असली मानव बनावटी
परतो तले
ढूँढे पाता नहीं 
क्या हुआ 
यदि मैं कहता
हम सब मिल जीए
सरल सादी ओर
निअंहकारी जिन्दगी 
अच्छा होगा नकारो मुझे 
अनुभव की चेतना
खुद जीवन 
उतरे 
ओर तुम निखरो
छगन लाल गर्ग।