क्या हुआ
नहीं आती दुनिया दारी
सलिका सभ्यता का
दोहराता हूँ बंधे बंधे बोल
बाप दादो से अर्जित
संयमित जीने के
नकारा हैं तुम्हारे लिए
रोकते हैं तुम्हें
स्वछन्द आचरण से
ओर होती जाती मेरी उपेक्षा
स्वीकार्य हैं मुझे
कहलाता हूँ पिछड़ा शख्स
क्या हुआ
अगर मे गलती तुम्हारी
कहता हूँ हित पहचान
मेरा भी तुम्हारा भी
तुम रचते हो षड्यंत्र
मेरे अस्तित्व मिटाने का
ओर धुन्ध मे जीने को
होते हो मजबूर
भ्रमित जिन्दगी पतन की
क्या हुआ
यदि मैं कहता हूँ
जिओ खुशबू दार जिन्दगी
ओर तुम लगाते जाते
नित नया स्प्रे इत्र
बनावटी ओर बेअसर
कैसे होगा इन्तजाम
नयी मानवता का
अति पुष्ट देखता हूँ भरा भरा
अंहकारी पुतला तुम्हारी
नयी जिन्दगी
नयी सभ्यता
ओर नये संस्कारों का
कि असली मानव बनावटी
परतो तले
ढूँढे पाता नहीं
क्या हुआ
यदि मैं कहता
हम सब मिल जीए
सरल सादी ओर
निअंहकारी जिन्दगी
अच्छा होगा नकारो मुझे
अनुभव की चेतना
खुद जीवन
उतरे
ओर तुम निखरो ।
छगन लाल गर्ग।
नहीं आती दुनिया दारी
सलिका सभ्यता का
दोहराता हूँ बंधे बंधे बोल
बाप दादो से अर्जित
संयमित जीने के
नकारा हैं तुम्हारे लिए
रोकते हैं तुम्हें
स्वछन्द आचरण से
ओर होती जाती मेरी उपेक्षा
स्वीकार्य हैं मुझे
कहलाता हूँ पिछड़ा शख्स
क्या हुआ
अगर मे गलती तुम्हारी
कहता हूँ हित पहचान
मेरा भी तुम्हारा भी
तुम रचते हो षड्यंत्र
मेरे अस्तित्व मिटाने का
ओर धुन्ध मे जीने को
होते हो मजबूर
भ्रमित जिन्दगी पतन की
क्या हुआ
यदि मैं कहता हूँ
जिओ खुशबू दार जिन्दगी
ओर तुम लगाते जाते
नित नया स्प्रे इत्र
बनावटी ओर बेअसर
कैसे होगा इन्तजाम
नयी मानवता का
अति पुष्ट देखता हूँ भरा भरा
अंहकारी पुतला तुम्हारी
नयी जिन्दगी
नयी सभ्यता
ओर नये संस्कारों का
कि असली मानव बनावटी
परतो तले
ढूँढे पाता नहीं
क्या हुआ
यदि मैं कहता
हम सब मिल जीए
सरल सादी ओर
निअंहकारी जिन्दगी
अच्छा होगा नकारो मुझे
अनुभव की चेतना
खुद जीवन
उतरे
ओर तुम निखरो ।
छगन लाल गर्ग।