Wednesday, June 8, 2016

स्वप्नवत अहसास

स्वप्नवत हैं अहसास भी
क्षण का भ्रम
अधिकतम का अंश रहा
जीवन पर्यन्त
अब हम जागते जीते
नहीं यह स्वप्न दशा
कि खुलते ऑख भंग होती
खुली ऑखो के रहते
देखते रोकते
सुंदर सलोने चाहत भरे अपने
औझल होते व्यतीत होते
क्या जीये वे
सपना या कि जीवन
बंद ऑखो के सपने मे
ओर खुली ऑखो के जीवन मे
नहीं दिखता फर्क
दोनों अवस्था मे
हम विवश मौन हुए
कठपुतली के पात्र बने
अदाकारी ही करते
उसकी मरजी
भ्रम बहुत बारिक
अहसासो का
कि खुली ऑखो से समझ लेते
हमारा किया कराया
जबकि स्वप्न मे
अलौकिक अनभिज्ञ का सब खेल
गहराई का अहसास
निष्पक्ष निष्कर्ष यही कहता
दोनों ही स्थिति मे
मानव केवल एक पात्र बना
कर्ता कोई ओर
जो सपने ओर जागृत
हर जीवन के अंश का साक्षी
हमें बनाता
कर्ता का अहसास देता
रा गुम्फन जाल है जीवन
ओर इसका सार मात्र
मोहाशक्त माया मार मृत्यु ।
छगन लाल गर्ग।