Wednesday, June 8, 2016

साक्षात्कार स्वयं का

नहीं कर पाता साक्षात्कार 
स्वयं का
डरने लगता हूँ 
भीतर के घने अंधेरे से
जा नहीं पाता भीतर 
बंद पाता हूँ द्वार चेतना का
अनमनेपन से घीरा घीरा
गुमसुम हुआ
जीने लगा हूँ शेष तुझे
आराधना के अंश
ढूँढता हूँ देवालयो मे
जहाँ बजती हैं सस्वर धुनें
ओर ऑख बंद किये
समग्र अस्तित्व
डूबते उतरते
साधना की गहराई लिए
संगीत धुन को गहरा किये
हस्तताल की ध्वनि के साथ
कंठ ध्वनि संगीत के बजते
स्वरों से मिलाते
संपूर्ण ऊर्जा का प्रदर्शन किए
दिखते हैं देवालयो के भक्त
ढूँढता हूँ कोई कतरा
बाहर के भक्तिमय पारावार मे
ईश्वरीय अंश लिए झलके
ओर दे रश्मि तनिक
मेरे भीतर व्याप्त अंधकार को
नहीं पाता
हताश ओर उदास हूँ
मुक्ति कैसे हो
भीतर टटोले बिना
अंधकार
बाहरी उपकरणों से नहीं
भीतर के सूर्य की
तपीस चाहता
जहाँ रजनी बिना सूर्य के
जहर घोलती बढती जाती
मौत की ओर
पहले इससे
करना होगा साक्षात्कार
स्वयं का
ओर यही
छीपा हुआ है असली ईश्वर
कठोर कालिमा के पर्दे पीछे
झाकने मात्र की हैं आवश्यकता ।
छगन लाल गर्ग।