असलियत नहीं हूँ मैं
जो दिखता हूँ या कि कहता हूँ
बड़ा फासला हैं
हम दोनों के बीच
शरीर ओर आत्मा का दूराव
प्रति दिन बढ़ता जाता
पूरा जीता हूँ शरीर सुबह से शाम
व्यक्तित्व के अनुसार
कर लेता हूँ बातचीत
पद यश ओर संपन्नता
सिखाती जाती आचरण
ओर होती वर्गीकृत मानवता
कहां आता आत्मा का ख्याल
नहीं पडती आवश्यकता
शरीर जीने मे
यही तो रिस्ते नाते का आधार
ओर सच कहना
मरने के बाद
क्या सुनने मे आयेगा कि जीये आत्मीयता
ओर पा सकोगे संतुष्टि कि
आत्मिक जीये
नहीं नहीं शरीर ही पहचान
इसे ही मिलती प्रसिद्धि
जीने तक
मेरी तरह अनेको जीते है शरीर
अकेला नहीं हूँ मै
एक लम्बी जमात का हिस्सा हूँ मैं
समझदारी से जीना आता
खूब देता हूँ त्वज्जौ
शरीर से जूडी सुख सुविधाओं पर
ओर होती रहती हीन
नित आत्मा मेरी
चित घीरा घीरा काले बादल सम
विचारों से अपने हित
ओर बढता पाता हूँ नित फासला
शरीर ओर आत्मा बीच
जैसे जैसे बढ़ती हैं समझदारी दुनियादारी
ओर ओर विवेक की रोशनी
बढ़ता अनंत अंतराल
नही महसूस करता स्वयं मे आत्मा
बन चुका हूँ सभ्य श्रेष्ठ शरीर ।
छगन लाल गर्ग ।
जो दिखता हूँ या कि कहता हूँ
बड़ा फासला हैं
हम दोनों के बीच
शरीर ओर आत्मा का दूराव
प्रति दिन बढ़ता जाता
पूरा जीता हूँ शरीर सुबह से शाम
व्यक्तित्व के अनुसार
कर लेता हूँ बातचीत
पद यश ओर संपन्नता
सिखाती जाती आचरण
ओर होती वर्गीकृत मानवता
कहां आता आत्मा का ख्याल
नहीं पडती आवश्यकता
शरीर जीने मे
यही तो रिस्ते नाते का आधार
ओर सच कहना
मरने के बाद
क्या सुनने मे आयेगा कि जीये आत्मीयता
ओर पा सकोगे संतुष्टि कि
आत्मिक जीये
नहीं नहीं शरीर ही पहचान
इसे ही मिलती प्रसिद्धि
जीने तक
मेरी तरह अनेको जीते है शरीर
अकेला नहीं हूँ मै
एक लम्बी जमात का हिस्सा हूँ मैं
समझदारी से जीना आता
खूब देता हूँ त्वज्जौ
शरीर से जूडी सुख सुविधाओं पर
ओर होती रहती हीन
नित आत्मा मेरी
चित घीरा घीरा काले बादल सम
विचारों से अपने हित
ओर बढता पाता हूँ नित फासला
शरीर ओर आत्मा बीच
जैसे जैसे बढ़ती हैं समझदारी दुनियादारी
ओर ओर विवेक की रोशनी
बढ़ता अनंत अंतराल
नही महसूस करता स्वयं मे आत्मा
बन चुका हूँ सभ्य श्रेष्ठ शरीर ।
छगन लाल गर्ग ।