Wednesday, June 8, 2016

अनुभूति का यथार्थ

बडी यंत्रणा भोगना 
मौन रहते भीतर ही भीतर 
कसक की अनुभूति का यथार्थ 
रह गया आज का चिन्तन 
अभिव्यक्ति के खतरे
दिखते नही
अहसास करने होते है
संभलते भी हो जाते सच्चाई के अंकन
ओर उपस्थित मानसिक तनाव
देने लगता
अभिव्यक्ति के खतरे
नही पाता लेखनी
अभिव्यक्ति की हर विधा
चलती है शासकीय बहाव
याद आते है दरबारी कवि
जो देते परिचय आकर
आत्मा मे रचनाकार के
शासकीय अभिव्यक्ति की होड
ओर सृजन का बौद्धिक बिम्ब
आम जीवन की अरूचि
असत्य का तार्किक स्वर
तोडता यथार्थ का अहसास
डरता है सत्य जीता साहित्यकार
यथार्थवाद से
समझ का क्षेत्र अब व्यापक नही
न्यायालय व व्यवस्थापिका
का आपसी मामलात बना
अभिव्यक्ति को
दिशा देता
ओर आज का सभ्य युग कार
साहित्यकार
आम जीवनशैली नही
सत्य यथार्थ की अभिव्यक्ति नही
अपने मकसद मे
अबाध प्रगतिशील है ।
छगनलाल गर्ग ।