चलो अच्छा रहा
एक घर ओर बढ गया
एक ओर भ्रम जो अब तक
मीठा लगता था
टूट गया
श्वास मत हो जाना अधीर
सहारा कोई ओर मिलेगा
आकुलाहट मे क्यों हो
मधुर पवन
द्वार किसी ओर का खुलेगा
बहुमूल्य हो तुम
उम्र पाये
नहीं रही बचपने की अबोधता
कि जवानी की विक्षिप्तता
गया तुम्हारा
जोश खरोश वाला पागलपन
हूई समझ गहरी
दृष्टि हुई तुम्हारी स्थिर
अब एक ओर घर छोडा तुमने
चलो अच्छा रहा
बनने दो नये घरों को
नया अस्तित्व जन्म ले सके
अपनी कला अपनी हुनर
ओर विकस सके मन का खुलापन
समा सके पीर मानवता की
नये बोध नये अर्थ लिए
होगा न होगा प्रपंच हैं यह
छोड़ो ना इसे
गूढ हो जाने दो अर्थो को
कि अंधियारा पीघलने लगे
तेरे ऑसू मोह जनित
बहना चाहे बहने दो
रोको मत इन्हें
गहन अनुभवो की पावनता हैं इनमें
अगर गंगा जल कहला सके
यह सम्मान बहुत काफी
ना समझो के लिए
यह दशा मेरी तुम्हारी जिन्दगी से
मत बान्धो
विकल व्यवस्थाओ से भी नहीं
अतिशय उमडे
यौवन प्रवाह की ऑधी के थमने तक
राह बनो
निरीह व्यवस्थाओ से संघर्षरत
थके माँदे बहुत से असहाय विवश बने
ताकते हैं तुम्हारी ओर
क्या रूके रहोगे
नये बने अपने आशियाने मे ही
फैसला तुम्हारा
तुम्हारी जिन्दगी के लिए ।
छगन लाल गर्ग ।
एक घर ओर बढ गया
एक ओर भ्रम जो अब तक
मीठा लगता था
टूट गया
श्वास मत हो जाना अधीर
सहारा कोई ओर मिलेगा
आकुलाहट मे क्यों हो
मधुर पवन
द्वार किसी ओर का खुलेगा
बहुमूल्य हो तुम
उम्र पाये
नहीं रही बचपने की अबोधता
कि जवानी की विक्षिप्तता
गया तुम्हारा
जोश खरोश वाला पागलपन
हूई समझ गहरी
दृष्टि हुई तुम्हारी स्थिर
अब एक ओर घर छोडा तुमने
चलो अच्छा रहा
बनने दो नये घरों को
नया अस्तित्व जन्म ले सके
अपनी कला अपनी हुनर
ओर विकस सके मन का खुलापन
समा सके पीर मानवता की
नये बोध नये अर्थ लिए
होगा न होगा प्रपंच हैं यह
छोड़ो ना इसे
गूढ हो जाने दो अर्थो को
कि अंधियारा पीघलने लगे
तेरे ऑसू मोह जनित
बहना चाहे बहने दो
रोको मत इन्हें
गहन अनुभवो की पावनता हैं इनमें
अगर गंगा जल कहला सके
यह सम्मान बहुत काफी
ना समझो के लिए
यह दशा मेरी तुम्हारी जिन्दगी से
मत बान्धो
विकल व्यवस्थाओ से भी नहीं
अतिशय उमडे
यौवन प्रवाह की ऑधी के थमने तक
राह बनो
निरीह व्यवस्थाओ से संघर्षरत
थके माँदे बहुत से असहाय विवश बने
ताकते हैं तुम्हारी ओर
क्या रूके रहोगे
नये बने अपने आशियाने मे ही
फैसला तुम्हारा
तुम्हारी जिन्दगी के लिए ।
छगन लाल गर्ग ।