Wednesday, June 8, 2016

प्रतिक्षा

कौन किसकी करता
प्रतिक्षा यहां 
नहीं यह मत कहो
कि मैं करता रहा प्रतिक्षा 
आपके आने की
यह तथ्य जान चुका हूँ मैं
सबका रहता
अपना हिसाब जीने का
उसमें से अधिकांश जीते
चापलूसी की दुनिया
नहीं रहेगा यह ठीक
कि मैं भर लू
आपके शब्दों से अपना अहंकार
ओर समझ बेठू
खुद को अपने आप से ऊँचा
नहीं हो सकेगा यह सब
जब कोई मुझे
मेरी औकात से ज्यादा देता हैं आदर
संभलना मुश्किल हो जाता
तब फिर
खत्म हो जाता है प्रयोजन
रूकने का
लगता जैसे कोई संगीतज्ञ
हृदय की वीणा
रागो की स्वर माधुरी पाया हो
फिर नहीं रहती जरूरत वीणा की
ठीक वैसे ही
बिना आत्मा के कहे तुम्हारे शब्द
कोमल चित मे
खरोचते हैं मुझे
तुम्हारी भावना मे
व्याप्त कुरूपता का घाव
शब्दों के साथ रीसता हैं
ओर जब
निहारता हूँ चेहरा तुम्हारा
आह कितना विषाद पाया
माधुर्य भी
होनी थी सुगंध की रौनक
कुरूपता का भीतर रूप
बार बार चूभने लगता हैं
तुम मेरी नहीं
अपनी आवश्यकताओ का
हल देखते हो
मुझमें
शायद कहीं ठौर पाते हो
दुनियादारी मे
ओर भ्रम दे सको
ओर मोहरा बनने लायक
पाते हो मुझे
यही कारण
कि तुम अपनी गरज
प्रतिक्षा करते हो मेरी ।
छगन लाल गर्ग ।