मुझे स्वीकार हैं
किस रूप मे जुडते हो तुम
दोस्ती की दुश्मनी
दो शैली चिर परिचित हैं
हम आपस की जिन्दगी बांटते
एक दूसरे से
कभी बन जाते हम दीन दुर्बल
जब हमारी गरज लेती अंगडाईयां
कभी मस्त तगडेपन के इरादों के साथ
जब ओरो की रहती परेशानियां
अब ढंग का बदलना
हमारे आचरण का एक पहेलु
जो देता रहता हमारी जानकारी
कि हम आखिर हैं क्या
ख्याल रखते हैं
हर दशा मे हम अपना
कि हो सके
अप्रत्यक्ष लाभ भी प्रसिद्धि भी
बड़े कुशल हैं हम दुनियादारी मे
भीतर बाहर का
रखते हैं पूरा तजूर्बा
कि ना रह सके पीछे
झपटने की कला मे
अब यही तो कहता हूँ मैं
तुम जुडो जैसे भी हो
यह सब तुम्हारा हिसाब
मेरा नहीं
अब तुम लेते हो
विभिन्न रूप मिलने निमित्त
किसी भी गरज
किसी गरजमंद की तरह
किसी मतलबी की तरह
किसी तडंग शक्तिवान की तरह
होते तुम प्रतिनिधि उसके ही
रूप बदलने से क्या
चढावा तो तुम्हें ही देना हैं
मुझे स्वीकार हैं
तुम्हारी हर लीला
भीखमंगा भी सम्राट भी
केवल तू हैं तेरा ही किया कराया
नहीं रख पाता
मेरे प्रभु
क ई बार यह हिसाब
विनति का माला का अर्ज का
बस चलता रहता
यह सब बेभान सा
व्रत नियम उद्दापन
ओर वार त्यौहार
सब विश्रृंखलित जीता
ओर जहां रहती संगत तेरी
मूक मौन एकांत
निहारता जाता
तेरे वाचाल झूमते भजनियों को
डूबते उतरते तेरे रससंसार
शायद शर्माता हूँ मैं
सबके सामने तुझे पुकारते
या कि अहंकार से पीडित
नहीं बुलाता तुझे
या कि भक्ति का दंभ
रोकता मुझे
रात के एकांत मे
जब न हो पाये
कानों कान खबर
किसी ओर को
पुकार लेता प्रभु मेरे
ओर अहसास होता
सुनते हो तुम मुझे
पर दुनियादारी मे
किसी भी रूप मे आओ
स्वीकार हैं मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।
किस रूप मे जुडते हो तुम
दोस्ती की दुश्मनी
दो शैली चिर परिचित हैं
हम आपस की जिन्दगी बांटते
एक दूसरे से
कभी बन जाते हम दीन दुर्बल
जब हमारी गरज लेती अंगडाईयां
कभी मस्त तगडेपन के इरादों के साथ
जब ओरो की रहती परेशानियां
अब ढंग का बदलना
हमारे आचरण का एक पहेलु
जो देता रहता हमारी जानकारी
कि हम आखिर हैं क्या
ख्याल रखते हैं
हर दशा मे हम अपना
कि हो सके
अप्रत्यक्ष लाभ भी प्रसिद्धि भी
बड़े कुशल हैं हम दुनियादारी मे
भीतर बाहर का
रखते हैं पूरा तजूर्बा
कि ना रह सके पीछे
झपटने की कला मे
अब यही तो कहता हूँ मैं
तुम जुडो जैसे भी हो
यह सब तुम्हारा हिसाब
मेरा नहीं
अब तुम लेते हो
विभिन्न रूप मिलने निमित्त
किसी भी गरज
किसी गरजमंद की तरह
किसी मतलबी की तरह
किसी तडंग शक्तिवान की तरह
होते तुम प्रतिनिधि उसके ही
रूप बदलने से क्या
चढावा तो तुम्हें ही देना हैं
मुझे स्वीकार हैं
तुम्हारी हर लीला
भीखमंगा भी सम्राट भी
केवल तू हैं तेरा ही किया कराया
नहीं रख पाता
मेरे प्रभु
क ई बार यह हिसाब
विनति का माला का अर्ज का
बस चलता रहता
यह सब बेभान सा
व्रत नियम उद्दापन
ओर वार त्यौहार
सब विश्रृंखलित जीता
ओर जहां रहती संगत तेरी
मूक मौन एकांत
निहारता जाता
तेरे वाचाल झूमते भजनियों को
डूबते उतरते तेरे रससंसार
शायद शर्माता हूँ मैं
सबके सामने तुझे पुकारते
या कि अहंकार से पीडित
नहीं बुलाता तुझे
या कि भक्ति का दंभ
रोकता मुझे
रात के एकांत मे
जब न हो पाये
कानों कान खबर
किसी ओर को
पुकार लेता प्रभु मेरे
ओर अहसास होता
सुनते हो तुम मुझे
पर दुनियादारी मे
किसी भी रूप मे आओ
स्वीकार हैं मुझे ।
छगन लाल गर्ग ।