उठते ही चुभते
रोशनी के कतरे
मलते हैं ऑखे
सक्षम बनाने निमित्त
रात भर के विश्राम बाद
खुली ऑखो से
प्रकाश का साक्षात्कार
समन्वय लेता
उजागर करता जाता
ऑखो की
अंतिम पहुँच तक का दृश्य
ओर समाने लगता
अच्छा भाता भीतर अनायास ही
बिना प्रतिक्रिया
पर कुछ दृश्य रह जाते
अनचाहे अनभाये
बाहर के बाहर नहीं प्रवेश पाते
हृदय मे
इन्द्रियां चलाये जा रही हमें
बडा जटिल हैं यह जीवन
सौन्दर्य बौध हमारा विवशता भरा
नहीं है मालिक हम हृदय के
सुंदरता हम चाहे ना चाहे
अनायास उतरती जाती चित की गहराई तल
ओर हम ठगे से विमोहित
निहारते चाह का निर्णय नहीं हमारा
यह एक आग्रह हैं भीतर का
इन्द्रियों का
जिसे अस्वीकार करना हमारे वश नहीं
हमारा देखना उतारना भी
कहां हैं संतोष का सार
बड़ा भटकना हैं जीवन मे
अगर जीवन को कह दो परीक्षा
ठीक रहेगा
एक जटिलता मे डालना ही
होता हैं परीक्षा
जहाँ होता व्यक्तित्व का अंकन
ज्ञान ओर चेतना का
सूझ ओर क्षमता का
यही आकार संसार की निष्पक्षता का
जहाँ मौन पकड़ झंकझौरता अस्तित्व
ओर चिन्तन शरीर व प्रकृति
करती रहती साथ साथ
आकार का विस्तार
मोह ओर स्नेह राग के साथ
मायिक जीवन की यह घड़ी
अमृत दायिनी भी रस दायिनी भी
अब निर्भर रहता परीक्षार्थी पर
कि वह सौन्दर्य सार मे से
रसपान करे या कि अमृत पान
यह निर्णय इन्द्रियां नहीं
जीवन कक्ष मे बैठे
करना होता हैं हर परीक्षार्थी को ।
छगन लाल गर्ग ।
रोशनी के कतरे
मलते हैं ऑखे
सक्षम बनाने निमित्त
रात भर के विश्राम बाद
खुली ऑखो से
प्रकाश का साक्षात्कार
समन्वय लेता
उजागर करता जाता
ऑखो की
अंतिम पहुँच तक का दृश्य
ओर समाने लगता
अच्छा भाता भीतर अनायास ही
बिना प्रतिक्रिया
पर कुछ दृश्य रह जाते
अनचाहे अनभाये
बाहर के बाहर नहीं प्रवेश पाते
हृदय मे
इन्द्रियां चलाये जा रही हमें
बडा जटिल हैं यह जीवन
सौन्दर्य बौध हमारा विवशता भरा
नहीं है मालिक हम हृदय के
सुंदरता हम चाहे ना चाहे
अनायास उतरती जाती चित की गहराई तल
ओर हम ठगे से विमोहित
निहारते चाह का निर्णय नहीं हमारा
यह एक आग्रह हैं भीतर का
इन्द्रियों का
जिसे अस्वीकार करना हमारे वश नहीं
हमारा देखना उतारना भी
कहां हैं संतोष का सार
बड़ा भटकना हैं जीवन मे
अगर जीवन को कह दो परीक्षा
ठीक रहेगा
एक जटिलता मे डालना ही
होता हैं परीक्षा
जहाँ होता व्यक्तित्व का अंकन
ज्ञान ओर चेतना का
सूझ ओर क्षमता का
यही आकार संसार की निष्पक्षता का
जहाँ मौन पकड़ झंकझौरता अस्तित्व
ओर चिन्तन शरीर व प्रकृति
करती रहती साथ साथ
आकार का विस्तार
मोह ओर स्नेह राग के साथ
मायिक जीवन की यह घड़ी
अमृत दायिनी भी रस दायिनी भी
अब निर्भर रहता परीक्षार्थी पर
कि वह सौन्दर्य सार मे से
रसपान करे या कि अमृत पान
यह निर्णय इन्द्रियां नहीं
जीवन कक्ष मे बैठे
करना होता हैं हर परीक्षार्थी को ।
छगन लाल गर्ग ।