Sunday, June 12, 2016

वापसी की ओर

कदम भारी लगते
वापसी का वक्त 
आशा का टूटना भी
तकदीर का अंश 
या जीने की कला मे
विकृति कहूँ 
जो प्रकृति दत 
या स्वयं गढी
कह नहीं सकता
कहना भी निष्पक्ष होगा 
कैसे मानू
मानव जो ठहरा
अस्तित्व झुठलाया सा
अनुभूत हूँ मैं 
कसूर उनका कहां 
मेरा हैं 
जो भूल करता रहा
जीवन भर
परिणति हूँ आज 
मैं भूल तेरी
छाया धूप मे साथी रही
पर
जीवन समय का संध्या काल
दम तोड़ा हैं साथी ने
अकेला हूँ 
वापसी हैं 
शक्ले बिम्ब बनी साथ 
छोड़ती कहां 
दृश्य उभरता 
बार बार फिर फिर 
सिसक उठा हूँ 
भीतर से
युवा काल तक का
साथ मेरे मित्र 
दाह संस्कार के साथ ही
विलिन हो गया 
क्या करे मित्र 
सीमाये हैं जीने की
बीमारी तुम्हारी सिर्फ 
बहाना हैं 
कि संचय रहे जमाने को
अन्यथा ले ले
मदद कहां दे पाया तुम्हें 
कि आत्मा सन्तुष्ट हो
सीमा हैं 
ओर आज तुम्हारे घर 
भाइयों की फुस फुस
तुम्हारी सम्पत्ति को लेकर
बढ़ी हैं 
काश ।तुम भी
औलाद रखते
पेर खड्डा बिना ऑख चित 
कहां देखता हैं 
भारतीय सड़के सचेत करती
मुझे 
मैं भीतर उठे
जजबाती ऑसूओ को रोकता
संभलता सा
देखता चल रहा हूँ 
मेरा यह चलना
क्या सार्थक होगा कभी 
निश्वास लेता
बढता हूँ 
वापसी की ओर
जीने की ओर।
छगनलाल गर्ग।