कदम भारी लगते
वापसी का वक्त
आशा का टूटना भी
तकदीर का अंश
या जीने की कला मे
विकृति कहूँ
जो प्रकृति दत
या स्वयं गढी
कह नहीं सकता
कहना भी निष्पक्ष होगा
कैसे मानू
मानव जो ठहरा
अस्तित्व झुठलाया सा
अनुभूत हूँ मैं
कसूर उनका कहां
मेरा हैं
जो भूल करता रहा
जीवन भर
परिणति हूँ आज
मैं भूल तेरी
छाया धूप मे साथी रही
पर
जीवन समय का संध्या काल
दम तोड़ा हैं साथी ने
अकेला हूँ
वापसी हैं
शक्ले बिम्ब बनी साथ
छोड़ती कहां
दृश्य उभरता
बार बार फिर फिर
सिसक उठा हूँ
भीतर से
युवा काल तक का
साथ मेरे मित्र
दाह संस्कार के साथ ही
विलिन हो गया
क्या करे मित्र
सीमाये हैं जीने की
बीमारी तुम्हारी सिर्फ
बहाना हैं
कि संचय न रहे जमाने को
अन्यथा न ले ले
मदद कहां दे पाया तुम्हें
कि आत्मा सन्तुष्ट हो
सीमा हैं
ओर आज तुम्हारे घर
भाइयों की फुस फुस
तुम्हारी सम्पत्ति को लेकर
बढ़ी हैं
काश ।तुम भी
औलाद रखते
पेर खड्डा बिना ऑख चित
कहां देखता हैं
भारतीय सड़के सचेत करती
मुझे
मैं भीतर उठे
जजबाती ऑसूओ को रोकता
संभलता सा
देखता चल रहा हूँ
मेरा यह चलना
क्या सार्थक होगा कभी
निश्वास लेता
बढता हूँ
वापसी की ओर
जीने की ओर।
छगनलाल गर्ग।
वापसी का वक्त
आशा का टूटना भी
तकदीर का अंश
या जीने की कला मे
विकृति कहूँ
जो प्रकृति दत
या स्वयं गढी
कह नहीं सकता
कहना भी निष्पक्ष होगा
कैसे मानू
मानव जो ठहरा
अस्तित्व झुठलाया सा
अनुभूत हूँ मैं
कसूर उनका कहां
मेरा हैं
जो भूल करता रहा
जीवन भर
परिणति हूँ आज
मैं भूल तेरी
छाया धूप मे साथी रही
पर
जीवन समय का संध्या काल
दम तोड़ा हैं साथी ने
अकेला हूँ
वापसी हैं
शक्ले बिम्ब बनी साथ
छोड़ती कहां
दृश्य उभरता
बार बार फिर फिर
सिसक उठा हूँ
भीतर से
युवा काल तक का
साथ मेरे मित्र
दाह संस्कार के साथ ही
विलिन हो गया
क्या करे मित्र
सीमाये हैं जीने की
बीमारी तुम्हारी सिर्फ
बहाना हैं
कि संचय न रहे जमाने को
अन्यथा न ले ले
मदद कहां दे पाया तुम्हें
कि आत्मा सन्तुष्ट हो
सीमा हैं
ओर आज तुम्हारे घर
भाइयों की फुस फुस
तुम्हारी सम्पत्ति को लेकर
बढ़ी हैं
काश ।तुम भी
औलाद रखते
पेर खड्डा बिना ऑख चित
कहां देखता हैं
भारतीय सड़के सचेत करती
मुझे
मैं भीतर उठे
जजबाती ऑसूओ को रोकता
संभलता सा
देखता चल रहा हूँ
मेरा यह चलना
क्या सार्थक होगा कभी
निश्वास लेता
बढता हूँ
वापसी की ओर
जीने की ओर।
छगनलाल गर्ग।