अब नहीं कहता
ढलान उतार कदम नियंत्रित रहे
ओर मैं गिरने से बचू
अब क्या होगा
यदि कहूँ
संतुलित रहो
परिहास ही होगा मेरा
तुम जान चुके हो आज का सत्य
जितना ढलान तेजी से
उतरते हो
मूल्यों का मखोल उडाते
दोनों हाथों से
परायो का खाते खिलाते
साथी तुम्हारा
तेजी से इन्तजार करते हैं
एक भारी भीड़ तुम्हारी
स्वार्थ खाती पीती
वैभव जीती हैं
कहां रोकता मैं
केवल सोचता भर हूँ
संस्कारों का ढलान
इतनी तेजी नीचे जायेगा
कल्पना कहां थी
पर तुम सभ्य बनने पर तुले हो
देखा देखी
होडा होडी
भारतीय संस्कृति को
पेरो तले
रौदते
पराकाष्ठा हैं ढलान की
अति उग्र अति तेज
भौतिकता पाना लक्ष्य तुम्हारा
कि सिसकारता हैं
एक वर्ग
जो असभ्य
जो मेहनतकस
जो सत्य जीता
आत्मा मौजूद रखता
भाई मेरे
तुम उन्माद गहरे डूबे हो
बातें मेरी
दकियानुसी समझे
हंसी मे उडाते हो
पर ढलान गर्त की मंजिल हैं
ओर तुम दौड लगाये हो
असंतुलित तन मन लेकर
गिरे नहीं
पर गिरना इसी राह होता हैं
यही यही हैं
सुनो तो
चढान का राह भी हैं
थोड़ी नजरें ऊँची तो हो
वहीं जीवन सार
मानव का होना
तय वहीं तो होता हैं
परिवर्तन तुम्हारा
भावी क्या रहेगा
अब नहीं कहता।
छगनलाल गर्ग।
ढलान उतार कदम नियंत्रित रहे
ओर मैं गिरने से बचू
अब क्या होगा
यदि कहूँ
संतुलित रहो
परिहास ही होगा मेरा
तुम जान चुके हो आज का सत्य
जितना ढलान तेजी से
उतरते हो
मूल्यों का मखोल उडाते
दोनों हाथों से
परायो का खाते खिलाते
साथी तुम्हारा
तेजी से इन्तजार करते हैं
एक भारी भीड़ तुम्हारी
स्वार्थ खाती पीती
वैभव जीती हैं
कहां रोकता मैं
केवल सोचता भर हूँ
संस्कारों का ढलान
इतनी तेजी नीचे जायेगा
कल्पना कहां थी
पर तुम सभ्य बनने पर तुले हो
देखा देखी
होडा होडी
भारतीय संस्कृति को
पेरो तले
रौदते
पराकाष्ठा हैं ढलान की
अति उग्र अति तेज
भौतिकता पाना लक्ष्य तुम्हारा
कि सिसकारता हैं
एक वर्ग
जो असभ्य
जो मेहनतकस
जो सत्य जीता
आत्मा मौजूद रखता
भाई मेरे
तुम उन्माद गहरे डूबे हो
बातें मेरी
दकियानुसी समझे
हंसी मे उडाते हो
पर ढलान गर्त की मंजिल हैं
ओर तुम दौड लगाये हो
असंतुलित तन मन लेकर
गिरे नहीं
पर गिरना इसी राह होता हैं
यही यही हैं
सुनो तो
चढान का राह भी हैं
थोड़ी नजरें ऊँची तो हो
वहीं जीवन सार
मानव का होना
तय वहीं तो होता हैं
परिवर्तन तुम्हारा
भावी क्या रहेगा
अब नहीं कहता।
छगनलाल गर्ग।