Sunday, June 12, 2016

अब नहीं कहता

अब नहीं कहता 
ढलान उतार कदम नियंत्रित रहे
ओर मैं गिरने से बचू
अब क्या होगा
यदि कहूँ 
संतुलित रहो
परिहास ही होगा मेरा
तुम जान चुके हो आज का सत्य 
जितना ढलान तेजी से
उतरते हो
मूल्यों का मखोल उडाते
दोनों हाथों से
परायो का खाते खिलाते
साथी तुम्हारा 
तेजी से इन्तजार करते हैं 
एक भारी भीड़ तुम्हारी
स्वार्थ खाती पीती 
वैभव जीती हैं 
कहां रोकता मैं 
केवल सोचता भर हूँ 
संस्कारों का ढलान
इतनी तेजी नीचे जायेगा
कल्पना कहां थी
पर तुम सभ्य बनने पर तुले हो
देखा देखी 
होडा होडी
भारतीय संस्कृति को
पेरो तले
रौदते 
पराकाष्ठा हैं ढलान की
अति उग्र अति तेज 
भौतिकता पाना लक्ष्य तुम्हारा
कि सिसकारता हैं 
एक वर्ग
जो असभ्य
जो मेहनतकस
जो सत्य जीता
आत्मा मौजूद रखता
भाई मेरे 
तुम उन्माद गहरे डूबे हो
बातें मेरी
दकियानुसी समझे
हंसी मे उडाते हो
पर ढलान गर्त की मंजिल हैं 
ओर तुम दौड लगाये हो
असंतुलित तन मन लेकर
गिरे नहीं 
पर गिरना इसी राह होता हैं 
यही यही हैं 
सुनो तो 
चढान का राह भी हैं 
थोड़ी नजरें ऊँची तो हो
वहीं जीवन सार
मानव का होना
तय वहीं तो होता हैं 
परिवर्तन तुम्हारा
भावी क्या रहेगा 
अब नहीं कहता।
छगनलाल गर्ग।