सिर झकाये
चलने का अहसास
भीतर को मंथन देता है
एक अनजाना सा
पर कही खुद के व्यक्तित्व से
मेल खाता सा
पर इसे अपना कहना
धोखा होगा
गति की पहचान से भिन्न है
यह चलना
खोया सा विश्रंखलन हुआ सा
पेरो के निशान पाता हू
कुछ उभरे कुछ बिखरे
कुछ मिटे से
पर आभास दे जाते है
कि लोग चले है
पहलो के निशान
धुधला गये है
उभरे से अभी अभी चले है
चलता हू
सोचता हू
इसी तरह तो
ठीक यही तो जीवन है
मेरा तुम्हारा
छाप रखोगे कैसे
नये पद चिन्ह
तुम्हे मिटाने से ही
तो उभरेगे
खालीपन मिलने की राह
बेमानी है
चलते रहो
उभरते रहो
ओर
ओर
मिटते रहो।
छगनलाल गर्ग।
चलने का अहसास
भीतर को मंथन देता है
एक अनजाना सा
पर कही खुद के व्यक्तित्व से
मेल खाता सा
पर इसे अपना कहना
धोखा होगा
गति की पहचान से भिन्न है
यह चलना
खोया सा विश्रंखलन हुआ सा
पेरो के निशान पाता हू
कुछ उभरे कुछ बिखरे
कुछ मिटे से
पर आभास दे जाते है
कि लोग चले है
पहलो के निशान
धुधला गये है
उभरे से अभी अभी चले है
चलता हू
सोचता हू
इसी तरह तो
ठीक यही तो जीवन है
मेरा तुम्हारा
छाप रखोगे कैसे
नये पद चिन्ह
तुम्हे मिटाने से ही
तो उभरेगे
खालीपन मिलने की राह
बेमानी है
चलते रहो
उभरते रहो
ओर
ओर
मिटते रहो।
छगनलाल गर्ग।