विश्वास किसे कहू
भ्रमित विवेक
शास्त्रीय ज्ञान
रिस्ते नाते
संस्कारित परम्पराये
सभी का मानना
विश्वास कहूँ
संचय बढ़ा हैं
जीवन पद्धति जीते जीते
यथार्थ का तजुर्बा
बढ़ा घना हैं
ओर यथार्थ
विश्वास तोड़ता
अपनी अकड खड़ा हैं
बाँधने निकला हूँ विश्वास तुझे
जीवन के साथ
तुम हो कि काँच माफिक
फिसलते हाथ से
गिरते ही
या कि चटकते हाथ से
बिदकते से
बहुत दूर पहुँच से बाहर
हो जाते हो
बाँधना हो कैसे
देखते देखते टूट जाते हो
ओर यथार्थ
विशालाकार होता
रौदता है मुझे
कसक प्राणों की
मेरे कवि
तू ही हैं
जो स्पर्श करता
देता हैं शब्द का शरीर
अन्यथा पीर भीतरी
अछूती रह जाती
मुझे कहां पहचान मिलती।
छगनलाल गर्ग।
भ्रमित विवेक
शास्त्रीय ज्ञान
रिस्ते नाते
संस्कारित परम्पराये
सभी का मानना
विश्वास कहूँ
संचय बढ़ा हैं
जीवन पद्धति जीते जीते
यथार्थ का तजुर्बा
बढ़ा घना हैं
ओर यथार्थ
विश्वास तोड़ता
अपनी अकड खड़ा हैं
बाँधने निकला हूँ विश्वास तुझे
जीवन के साथ
तुम हो कि काँच माफिक
फिसलते हाथ से
गिरते ही
या कि चटकते हाथ से
बिदकते से
बहुत दूर पहुँच से बाहर
हो जाते हो
बाँधना हो कैसे
देखते देखते टूट जाते हो
ओर यथार्थ
विशालाकार होता
रौदता है मुझे
कसक प्राणों की
मेरे कवि
तू ही हैं
जो स्पर्श करता
देता हैं शब्द का शरीर
अन्यथा पीर भीतरी
अछूती रह जाती
मुझे कहां पहचान मिलती।
छगनलाल गर्ग।