Sunday, June 12, 2016

मेरे अपने

मेरे अपने
तुम भी रात जागे हो
हर पहलू सोते तुम्हे
करवट बदलते देखा हैं 
बंद आखो से फिर 
जगते देखा हैं 
तन की तडपन से
बेखबर हो
निन्द घनेरी
बुलाते देखा हैं 
बीती विभावरी
मेरे अपने पीर तुम्हारी
प्रभात बेला फिर 
नयन तुम्हारी घिरते देखा हैं 
विरह पीर को
चुपके चुपके
विशाल नयनो से
झरते देखा हैं 
अकारण नहीं यह
पल पल मेरे 
हृदय गगन मे
तुम को मैने पीडा अपनी 
जुडते देखा हैं 
जीवन के इस परम सत्य को
वियोग प्रति पल को
बिछुडे अपने
साथ साथ हुए से
अन्तर मन से
भुगते देखा हैं
छगनलाल गर्ग।