Friday, June 10, 2016

छाया

सरकती हैं छाया 
बदलती जाती स्थान 
नहीं रहती वहीं 
जहां सूर्य की रश्मिओ का 
होता जाता आगमन 
फिसलती सी ढूँढती जाती
अस्तित्व अपना
तपन का प्रकाश नहीं होता
बर्दाश्त
कोमलता की देह लिए
देती अपने शीतल गोदी का आश्रय
धूप दग्ध हृदयो को
तपन की ऊर्जा
अति छाया का घना जमाव
हिम शैल हुआ चित
पिघलन पाया
बहता हैं अथाह जीवन सागर
नद बन
कि हो पाये निर्मल यह धरा
बने उपवन
खिले कुसुम सुरभित लिए
छाया धूप का यह खेल
स्पंदन करता जाता
जीवन मेरा कि होता अहसास
जीवन का
छाया की ओट ही नित छिप जाता
रश्मियो का जाल
यह झीना सा पर्दा
जीवन का
मात्र अहसास भरता
कि रश्मिओ की तपन
छाया का पूर्वाभास ही
अहसास पाये
ओर सरकता जाये
वक्त की सीमा मे जीवन मेरा।
छगन लाल गर्ग।