राहे मिलती हैं
एक दूसरे से
कि नहीं रूके कदम
सरपट दौडती जिन्दगी का सच
कि रूके कहां
विश्रान्ति का सोर ढूँढते
निकलती जाती उम्र
एक लम्हा तो हो
जहां लगे कि रूके
ले सके श्वास
तस्सली से
आमंत्रित करती हैं राहे
अपनी नीजता का सफल दावा देती
असमझ सा चेतन
नहीं पाता निर्णय
मंजिल की राह का
ओर हर राह देती जाती
भटकावो का भंवर
दिग्भ्रान्त हुआ हमारा युवा
नहीं पाता ठौर मंजिल की
दौडती जिन्दगी मे मात्र
होना होता हैं सरीक
अपने आपको दाव लगाने पर भी
आती हैं हाथ विवशता
ओर पता नहीं चलता
कि जीवन रीतता रहा
कहां हैं खोट
क्या रास्तो मे
क्या चलते कदमों मे
या राहो की व्यवस्था मे
कि युवा केवल दौडते दिखे
मंजिल न मिले
सत्य बडा घिनोना हैं
सत्ता के गलियारो मे
अमानवीय चेहरे
नकाबो मे ढके हैं
वक्त निगल जाये हमारे युवाओ को
पहले इसके
बेनकाब करना ही
प्रजातंत्र की चुनौती
जिम्मेदारी निभानी होगी ।
छगन लाल गर्ग।
एक दूसरे से
कि नहीं रूके कदम
सरपट दौडती जिन्दगी का सच
कि रूके कहां
विश्रान्ति का सोर ढूँढते
निकलती जाती उम्र
एक लम्हा तो हो
जहां लगे कि रूके
ले सके श्वास
तस्सली से
आमंत्रित करती हैं राहे
अपनी नीजता का सफल दावा देती
असमझ सा चेतन
नहीं पाता निर्णय
मंजिल की राह का
ओर हर राह देती जाती
भटकावो का भंवर
दिग्भ्रान्त हुआ हमारा युवा
नहीं पाता ठौर मंजिल की
दौडती जिन्दगी मे मात्र
होना होता हैं सरीक
अपने आपको दाव लगाने पर भी
आती हैं हाथ विवशता
ओर पता नहीं चलता
कि जीवन रीतता रहा
कहां हैं खोट
क्या रास्तो मे
क्या चलते कदमों मे
या राहो की व्यवस्था मे
कि युवा केवल दौडते दिखे
मंजिल न मिले
सत्य बडा घिनोना हैं
सत्ता के गलियारो मे
अमानवीय चेहरे
नकाबो मे ढके हैं
वक्त निगल जाये हमारे युवाओ को
पहले इसके
बेनकाब करना ही
प्रजातंत्र की चुनौती
जिम्मेदारी निभानी होगी ।
छगन लाल गर्ग।