रहते नहीं वश मे कभी
उपाय कर चुका सभी
झील सी गहराई कभी
हृदय धारण करो अभी ।
यह जानता चित सूने रहे हो
पर मानता हूँ अकेले नहीं हो
ओर भी पीर झेलो से मिले हो
दर्द बाँट लेते खुद जीते रहो हो।
भावना राग भी क्या
संभावना आस लाया
स्नेह दीदार भी क्या
भरोसे का हृदय पाया।
स्वार्थ साधा स्वार्थ तोला
नेह लिपट स्पर्श रूप खेला
तृष्णा चाहत जोखिम झेला
निस्सार जीवन आज तोला ।
अब राग दे दो थक गया हूँ
सब भार दे दो ढक गया हूँ
लब बोल दे दो भूल गया हूँ
रब उर्ध्व लहर हैं डूब रहा हूँ ।
तुम आये भी क्या रजनी बन कर
अंधकार मे भी गहन रात बन कर
चेतन प्राणो का विराग राग होकर
पलक विरह अनंत स्वप्न बनकर।
उदभ्रान्त जीवन पावन ठौर चाहता
शास्वत स्नेह पारावार हैं नहीं पाता
रास्ता भ्रम घिर नित करवट बदलता
वासना मोहित जीवन झंझाल फसता ।
आज कहता फिर सत्य कह न सकूँगा
ऑधी उठी घनी बवंडर झेल न सकूँगा
दुनिया मे आवरण घना देख न सकूँगा
सत्य जीवन जीता कहीं पा न सकूँगा ।
आओ न सुगंध यह दुर्गंध घनी मिटाओ तो
लाओ न कुसुम वह मुक्त सौरभ फैलाओ तो
झाको न सत्य यह द्वार चेतन खुल जाये तो
छाओ न शीतल छाँव जीवन ताप मिटाओ तो।
छगन लाल गर्ग।
उपाय कर चुका सभी
झील सी गहराई कभी
हृदय धारण करो अभी ।
यह जानता चित सूने रहे हो
पर मानता हूँ अकेले नहीं हो
ओर भी पीर झेलो से मिले हो
दर्द बाँट लेते खुद जीते रहो हो।
भावना राग भी क्या
संभावना आस लाया
स्नेह दीदार भी क्या
भरोसे का हृदय पाया।
स्वार्थ साधा स्वार्थ तोला
नेह लिपट स्पर्श रूप खेला
तृष्णा चाहत जोखिम झेला
निस्सार जीवन आज तोला ।
अब राग दे दो थक गया हूँ
सब भार दे दो ढक गया हूँ
लब बोल दे दो भूल गया हूँ
रब उर्ध्व लहर हैं डूब रहा हूँ ।
तुम आये भी क्या रजनी बन कर
अंधकार मे भी गहन रात बन कर
चेतन प्राणो का विराग राग होकर
पलक विरह अनंत स्वप्न बनकर।
उदभ्रान्त जीवन पावन ठौर चाहता
शास्वत स्नेह पारावार हैं नहीं पाता
रास्ता भ्रम घिर नित करवट बदलता
वासना मोहित जीवन झंझाल फसता ।
आज कहता फिर सत्य कह न सकूँगा
ऑधी उठी घनी बवंडर झेल न सकूँगा
दुनिया मे आवरण घना देख न सकूँगा
सत्य जीवन जीता कहीं पा न सकूँगा ।
आओ न सुगंध यह दुर्गंध घनी मिटाओ तो
लाओ न कुसुम वह मुक्त सौरभ फैलाओ तो
झाको न सत्य यह द्वार चेतन खुल जाये तो
छाओ न शीतल छाँव जीवन ताप मिटाओ तो।
छगन लाल गर्ग।