सुबह की चाय
पूरा जगा देती
व्यक्ति को
आलस्य कणो का आभास
अनुभूति लेता मन ही मन
तभी तलब उभरती चाय की
हर घूट देता नशे भरी
स्फूर्ति
तन मन लेता
अहसास तृप्ति का
ओर बढना होता फिर
दिन भर कमाई देने वाली
क्रियाओं मे सलंग्न
संचित करने
सपनों का आसियाना
या कि बच्चों की फीस
जिन्हें अंतिम बार नोटिस मिला
उधर आस्था भरे
लहमो का भान देते
रंगीन गाड़ी मे विराजे
आते हैं ऋषि बने पुण्यात्मा
कर पाना उन्हें संतुष्ट
नहीं हर किसी की औकात
विवशता वश
हताश हुआ विनित हुआ
प्रकट करता अपनी असमर्थता
ओर प्रतिफलन मिलता जाता
साधूओ का फटकार तिरस्कार
बड़ी विवशता पाया हूँ
हमेशा की तरह
बिना चाय ही जगा जगा
निकलता जाता हूँ
काम की तलाश ।
छगन लाल गर्ग।
पूरा जगा देती
व्यक्ति को
आलस्य कणो का आभास
अनुभूति लेता मन ही मन
तभी तलब उभरती चाय की
हर घूट देता नशे भरी
स्फूर्ति
तन मन लेता
अहसास तृप्ति का
ओर बढना होता फिर
दिन भर कमाई देने वाली
क्रियाओं मे सलंग्न
संचित करने
सपनों का आसियाना
या कि बच्चों की फीस
जिन्हें अंतिम बार नोटिस मिला
उधर आस्था भरे
लहमो का भान देते
रंगीन गाड़ी मे विराजे
आते हैं ऋषि बने पुण्यात्मा
कर पाना उन्हें संतुष्ट
नहीं हर किसी की औकात
विवशता वश
हताश हुआ विनित हुआ
प्रकट करता अपनी असमर्थता
ओर प्रतिफलन मिलता जाता
साधूओ का फटकार तिरस्कार
बड़ी विवशता पाया हूँ
हमेशा की तरह
बिना चाय ही जगा जगा
निकलता जाता हूँ
काम की तलाश ।
छगन लाल गर्ग।