Thursday, June 9, 2016

मानवीय संवेदना

निहारना अच्छा लगता
कच्ची बस्तियों के लोग 
कच्चे घरों सी जिन्दगी जीते
सच्चाई भरी
निर्लिप्त हुए से काम रत अपने 
नही हो पाते पुख्ता 
हमारी तरह
समझ रह जाती बाकी 
दुनिया दारी की
पक्की दीवारों का पुख्तापन
बड़ी उम्र तक नहीं आता समझ
अंतिम छोर पर 
कौऐ सी चालाकी
नहीं आती पकड मे
कि हो सके 
जर्जर कच्ची दीवारे 
रूपान्तरित
हमारी तरह पक्की ऊँची उठती 
गर्व कहती
अपनी विकास गाथा
कि हर सदस्य रखता
अपना कमरा सुविधा देता 
जहाँ बुढो की दकियानुसी सोच
रूकती पक्की दीवारों 
की कठोरता पाकर
यही तो है कारण
संस्कारों को शुद्ध परिवेश पहनाये
मिटाने लगे हैं मानवीय संवेदना 
ओर निखरते क्षण 
देते जाते एकागी सुखो का
नया जीवन 
बासी जिन्दगी जीते
कच्ची बस्तियों के कच्चे 
परंतु सच्चे प्रेम मे
विभोर सा
ढूँढता गुमा हुआ पाता हूँ 
अस्तित्व मेरा
हैं यही इन्हीं से निर्मित
छगन लाल गर्ग।