Wednesday, June 8, 2016

बलिवेदी पर

शायद कूटा गया
धोते वक्त 
टूटे बटनो का कोट
आमंत्रित करता जाता 
सामने की हवा 
नहीं आता काम
हाथों का प्रयास
रोक सके
ठिठुरती हवा के धक्के
प्रवेश कर जाती
भीतर तक
ठीक उसी तरह
जैसे
अभावों की जिन्दगी
झकडी रहती
पैसों की तंगी लिए
आवश्यकताओ की लंबी सूची मे
सिलसिलाती धूप
नहीं करती प्रवेश
बंद गलियो मे
रूकती जाती
ऊँचे बहुमंजिले भवनों के पास
पैनी हवा याद दिलाती
टूटी खिड़की
ठिठुरन देती रात भर
उघडे मुह होता मुश्किल सोना
हर बार का बचाया
चढ जाता मंहगाई की भैट
सरकारी स्कूल मे
कहां हैं शिक्षक
बच्चों को भेजना पडा
प्राइवेट स्कूल
स्कूल यूनिफार्म का
नया पेटर्न
माँगने लगेगा बच्चों से
अतिरिक्त शुल्क
व्यवस्था करनी ही होगी
उसकी भी
निगाहे अटकती महसूस करता
बढता देखता हूँ
सड़क से थोडे अंतराल पर
कूडे करक्ट का जलता धुआँ
नथूने भर उठे
कडवे श्वास रोकते माहोल से
शायद स्वच्छ भारत अभियान
का यह बिम्ब
मूर्त होना चाहता
अभाव जीते गंदगी झेलते
श्वास लेने मे
संघर्ष करते आम लोगों की
बलिवेदी पर।
छगन लाल गर्ग।