Wednesday, June 8, 2016

पक्की दीवारें

रिस्तों की पक्की दीवारें 
मतलब की चमक तले
लेने लगी आकार 
बिखराव का
हर दीवार पर बाहरी प्लास्टर चढा
दरारे अधिक गहराती
जब जाता हूँ पास
घने कालेपन की सघनता
बाधित करती दृष्टि
नहीं जान पाता
आई दरार का कारण
नही कहती अपना विगत
दरार भी
कडवडाहट का दागित दृश्य
पाता हूँ बाहर बाहर
पक्की इमारतों की दरार
भीषण आघात झैले
रखना चाहती अपना वजूद
वहीं आकार वहीं रौनक
मोह का मुल्लमा चढाता
संवारता जाता हूँ दरार का अस्तित्व
नहीं हो पाता
पूरा विलुप्त दरार का दर्द
ओर उभरता बोध
यह जाने कि
पक्केपन निर्मित आकार का
शुद्रतम बोध पाता
यह दर्द दरार की सघनता को
अनुभूति मे बढाता
छालता जाता तन की दीवार
धूमिलता नहीं
पर अस्तित्व विलीनता का बोध
घेरे नहीं जिन्दगी
टूटकर भी
अटूटे असत्य बोध जीने को विवश
जिन्दगी तुझे ।
छगन लाल गर्ग।