Friday, June 3, 2016

स्नेहिल रिश्ते

निभाने होते 
अतीत के स्नेहिल रिश्ते 
घने अंतराल मे
वक्त भी विस्मृत हुआ 
स्नेह की नमनीय
रश्मि ढूँढ पकडता बार बार
ना हो जाये फिर धूमिल 
ओर इसी अहसास 
निकल आया 
अलौकिक अनुभूति भरने 
रिक्त हृदय 
मेरे स्नेही यह प्यार तुम्हारा 
धरोहर मेरा
गरिमा भरा 
ओजस्वी निखर जाता
निर्मल स्नेह धार नहला जाती 
जीया हूँ मित्र तुम्हें मेरी तरह
नहीं रखा विभाव अलगाव का
इसी अहसास पहुँचा 
तेरे रोशन धाम
आह घनेरे प्रेमी
प्रिय जनो का यह मेला
कुछ ओहदेदार
कुछ विगत झेल चुके ऊँचाईयाँ
सब चमकदार कोहीनूर 
इर्द गिर्द तुम्हारे
नहीं भूलना चाहता
मेरा मोह
उन चमकीले क्षणों को देखना 
ओर स्वर्ग सा आनंद देते जब
लगाया गले मुझे
सच कहूँ यह क्षण
जीवन का अमोलक गहना मेरा
नही रोक सके मुझे 
अच्छा किया 
हीनता भाव आखिर 
कोई कब तक
अपना हृदय सोखे 
चलो चलता हूँ यादो को लिए
सहारा बनेगी अवशेष का
छगन लाल गर्ग