Friday, June 3, 2016

विचार शक्ति

ठीक कहते अब
हमारे विचारक अनुभूति बिना
विचार शक्ति सामर्थ्य से
हर शिक्षित प्रभुत्व व्यक्ति 
समझ बूझ भरी शब्दावली
परिमार्जित 
संतुलित जटिल नापतोल
शब्दों को देते 
अपनी गरज का पहनावा 
कि लगने लगे 
अपरिमित शब्दों के धनी
ओर शब्द आये काम वस्त्रों की तरह
जहां जेसी निखार की आवश्यकता
उसी अनुरूप रहे पहनावा
शब्दों का
भई वाह बड़े करामती शब्दों के धनी
कितना खिला खिला शब्द सामर्थ्य 
नेता अभिनेताओं के 
अभिनय से अनंत ऊँचा
तुम्हारा प्रवचन आकाशवाणी 
अदृश्य की 
अवतरित होकर 
स्थूल आकार नकारती
बनाती तुम्हें 
निराकार आकार भ्रमित 
असमंजस तुम्हें नहीं 
श्रोताओं को होता
तुम्हारी वाकपटुता 
नहीं देती रास्ता 
कि निकलना हो सके
चमत्कारी हो तुम 
फसता रहता हर कोई 
तुम्हारी सामर्थ्य क्षमता पर 
सच यह तुम हो
प्रवीणता के धनी ईश्वर तुल्य
आवरण का घूँघट खुलने तक
ओर वह 
तुम्हारी व्यूह रचना के रहते
नहीं संभव ओर खेलते रहो
असलियत का नाटक यही 
तुम्हारी जीत
ओर इसी भ्रम 
युगों का सत्य 
असत्य की गठरी बांधा गया
ओर यहीं 
आवरण की गठरी 
अब बन चुकी सत्य 
अनंत की
ओर उड़ान भरती 
ऊँचाईयों मे 
आज
असलियत अनदेखी 
उदास मौन जर्जर 
मरणासन्न उपेक्षित होती 
नित हमारे से
छगन लाल गर्ग