Friday, June 3, 2016

अनंत आकाश

अनंत आकाश सिमट कर
परछाई बना
साथ ही
गुलमोहर के ताजा 
लालिमा देते 
फूलों को संग लेकर
उतर आया 
आज सुबह
मेरे चाय की कटोरी मे
सरकती चाय के 
हर घूँट मे
पीने लगा हूँ आकाश 
अनंत 
अच्छा अहसास होता
गरिमा की 
अनंत ऊँचाई चढा
आज मेरा व्यक्तित्व
सोचने लगा हूँ 
शायद यही तरीका रह गया 
अब
अरमान पूर्ण करने का
सिखना होगा जीना
परछाईयों के साथ 
आम आदमी के अच्छे सपने
उसके अच्छे दिन 
उसका यथार्थ 
इसी तरह 
परछाईयों से होता जीना
आज के युग
हकीकत यही 
अब भीड़ के नेतृत्व मे
समा गयी
ओर हर भीड़ बेचारी
सुख छलावे की 
आकाशिय परछाई के
नेतृत्व से कर लेती समझोता
अपना मताधिकार देकर
ओर फिर परिणाम यही 
कि बिना दूध की चाय मे
उतर आता 
अनंत ऊँचाईयां देता 
आकाश 
गरिमा युक्त छल 
भोगते इसी को
बुझानी होती 
पेट की भूख
या कि स्वाभिमान बैचते
मजबूर होते जीने 
देशी कुत्तों सी जिन्दगी 
चलो यही ठीक 
आत्मनिर्भर देश मे होता 
थोड़ा सा 
गर्व करो ओर कहो
भारत माता की जय
अहोभाग्य हिंदुस्तानी हो
मत भरो निश्वास
आयेगा समय करों इंतजार 
तब तक मानो सत्य छलावा
हर अभाव ईश्वरीय 
विवशता तुम्हारी भाग्य का छलवा
यही तकदीर यहीं सत्य इस युग का
छगन लाल गर्ग