Saturday, June 11, 2016

इन्तजार हैं

इन्तजार हैं 
छाया का
घनी दोपहरी मे
पिघली हड्डियो को
जिन्हें भरोसा दिया 
झोपड़ी का
पीढ़ियों का हैं भरोसा 
अब परम्परा मे बदला
देते जाते सीख
इस पीढ़ी को भी
करें इन्तजार
निभाये परम्परा 
बाहर की अंगीठी मे
पानी गर्माने का डिब्बा 
जला हैं 
टपकता हैं पानी 
बूझाता जाता हैं ताप उगलती आग
ठीक मेरी तरह
जला हैं घने जीवट मे
जिन्दगी जीने को
करता रहा अपने पात्र का
उपयोग 
पेट की भूख से
काम्पती हड्डियो को गर्माने मे
पर पात्र हुआ पुराना
छिद्र घनेरे पाया हूँ जख्मी हूँ 
टपकता हैं पानी वेदना का
गर्माहट का प्रयास लिए
जीता हूँ जिन्दगी 
ठिठूरे बच्चे अभी गर्माहट चाहते 
प्रभात हैं उनका
हिमपात से बचाना
चुनौती बना जीवन 
जीता हूँ 
आशाओ का इतिहास 
भविष्य को संबल नहीं देता 
हताश हूँ 
कहीं व्यवस्था मे चेतना आये
इन्तजार हैं
छगन लाल गर्ग।