इन्तजार हैं
छाया का
घनी दोपहरी मे
पिघली हड्डियो को
जिन्हें भरोसा दिया
झोपड़ी का
पीढ़ियों का हैं भरोसा
अब परम्परा मे बदला
देते जाते सीख
इस पीढ़ी को भी
करें इन्तजार
निभाये परम्परा
बाहर की अंगीठी मे
पानी गर्माने का डिब्बा
जला हैं
टपकता हैं पानी
बूझाता जाता हैं ताप उगलती आग
ठीक मेरी तरह
जला हैं घने जीवट मे
जिन्दगी जीने को
करता रहा अपने पात्र का
उपयोग
पेट की भूख से
काम्पती हड्डियो को गर्माने मे
पर पात्र हुआ पुराना
छिद्र घनेरे पाया हूँ जख्मी हूँ
टपकता हैं पानी वेदना का
गर्माहट का प्रयास लिए
जीता हूँ जिन्दगी
ठिठूरे बच्चे अभी गर्माहट चाहते
प्रभात हैं उनका
हिमपात से बचाना
चुनौती बना जीवन
जीता हूँ
आशाओ का इतिहास
भविष्य को संबल नहीं देता
हताश हूँ
कहीं व्यवस्था मे चेतना आये
इन्तजार हैं ।
छगन लाल गर्ग।
छाया का
घनी दोपहरी मे
पिघली हड्डियो को
जिन्हें भरोसा दिया
झोपड़ी का
पीढ़ियों का हैं भरोसा
अब परम्परा मे बदला
देते जाते सीख
इस पीढ़ी को भी
करें इन्तजार
निभाये परम्परा
बाहर की अंगीठी मे
पानी गर्माने का डिब्बा
जला हैं
टपकता हैं पानी
बूझाता जाता हैं ताप उगलती आग
ठीक मेरी तरह
जला हैं घने जीवट मे
जिन्दगी जीने को
करता रहा अपने पात्र का
उपयोग
पेट की भूख से
काम्पती हड्डियो को गर्माने मे
पर पात्र हुआ पुराना
छिद्र घनेरे पाया हूँ जख्मी हूँ
टपकता हैं पानी वेदना का
गर्माहट का प्रयास लिए
जीता हूँ जिन्दगी
ठिठूरे बच्चे अभी गर्माहट चाहते
प्रभात हैं उनका
हिमपात से बचाना
चुनौती बना जीवन
जीता हूँ
आशाओ का इतिहास
भविष्य को संबल नहीं देता
हताश हूँ
कहीं व्यवस्था मे चेतना आये
इन्तजार हैं ।
छगन लाल गर्ग।