जिन्दगी नहीं
शब्द जीते हैं हम
अनजानी हुई जिन्दगी
हमसे हमारी
अति व्यंजना शब्दों की
देती जाती हमे
नित नये छलावे
जिन्हें सहन करते जीना
मान चूके हम जिन्दगी
ओर यह शब्द भी
अपना बनावटी चमत्कार देते
कहां कहते भीतर का सच
पर गरिमा का आवरण लिए
कितने मासूमियत लिए
मीठी धारा मे अविरल
बहते जाते
दिव्य झलक ममत्व देते
करते जाते नेह व्याख्या
व्यञ्जना का मर्म झेलता
जाता चित
कैसे होगी पूरी अभिव्यक्ति
खिचते हैं रेखाये अधूरे सच की
यह खाका रह जाता अधूरा
जिन्दगी का
धोखा हैं यह शब्दों का
बहुत ज्यादा अंशो मे
बनावट जीते हैं शब्द
निश्छल स्नेह धारा को
करते जाते गंदला
भावनामय हृदय की
राहत हैं शब्द
पर असल अधूरा रह जाता
अभिव्यक्ति सामर्थ्य खोये हैं शब्द
मिश्रण हुआ हैं सभ्यता का
कंचन सा स्नेह
पल्लवित नहीं हो पाता
शब्दों तले
मौन संवेदना मरती जाती
आज के जीवन अस्तित्व तले
यह मौन स्नेह राग
बिना अभिव्यक्ति
खोलना चाहता
द्वार चेतना के
भीतरी स्नेह धारा प्रस्फुटन चाहती
बिना शब्द बिना राग लय
सत्य स्वीकारना ही होगा
आज नहीं तो कल
असल तो यह
जिन्दगी नहीं शब्द जीते हैं हम।
छगन लाल गर्ग
शब्द जीते हैं हम
अनजानी हुई जिन्दगी
हमसे हमारी
अति व्यंजना शब्दों की
देती जाती हमे
नित नये छलावे
जिन्हें सहन करते जीना
मान चूके हम जिन्दगी
ओर यह शब्द भी
अपना बनावटी चमत्कार देते
कहां कहते भीतर का सच
पर गरिमा का आवरण लिए
कितने मासूमियत लिए
मीठी धारा मे अविरल
बहते जाते
दिव्य झलक ममत्व देते
करते जाते नेह व्याख्या
व्यञ्जना का मर्म झेलता
जाता चित
कैसे होगी पूरी अभिव्यक्ति
खिचते हैं रेखाये अधूरे सच की
यह खाका रह जाता अधूरा
जिन्दगी का
धोखा हैं यह शब्दों का
बहुत ज्यादा अंशो मे
बनावट जीते हैं शब्द
निश्छल स्नेह धारा को
करते जाते गंदला
भावनामय हृदय की
राहत हैं शब्द
पर असल अधूरा रह जाता
अभिव्यक्ति सामर्थ्य खोये हैं शब्द
मिश्रण हुआ हैं सभ्यता का
कंचन सा स्नेह
पल्लवित नहीं हो पाता
शब्दों तले
मौन संवेदना मरती जाती
आज के जीवन अस्तित्व तले
यह मौन स्नेह राग
बिना अभिव्यक्ति
खोलना चाहता
द्वार चेतना के
भीतरी स्नेह धारा प्रस्फुटन चाहती
बिना शब्द बिना राग लय
सत्य स्वीकारना ही होगा
आज नहीं तो कल
असल तो यह
जिन्दगी नहीं शब्द जीते हैं हम।
छगन लाल गर्ग