Friday, June 3, 2016

मर्यादा पुरुषोत्तम

अंततः नमन तुझे 
मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम 
स्वीकार मुझे 
मानवीय स्थूल देह तुम्हारी
कृत्य नही रहे मानवीय 
पर असीम क्षमता मानव चित
देती रश्मि जो चीरती तम 
अहसास ईश्वरीय तुम्हारा 
नही त्यागना चाहता मेरे राम 
अमानवीय दिव्यता कहां रखा पाती
हमारे समान
नही कह सकता तुम्हें मानव
तुम भगवान मेरे 
संस्कृति संरक्षण निमित्त 
मूल्य प्रतिष्ठित समाज 
नूतन चाह पुकार उठी आज
विश्रृंखलित मानव मूल्य 
धरा जीवन असंतुलित आज
विवेक बना अहं मात्र 
शुष्कता व्याप्त मन चाहता वैभव गर्त
मानव मंथन सार बोध भ्रमित 
नही कोई रसायन जो राम बने
आनंद निर्झर पृथ्वी पर केवल 
राम नाम तुम्हारा 
केवल यही रस बहता
सत्य भी यही रस भी यही 
यह अमृत रस पान करे हर कोई 
मेरे राम तेरे नाम की
निर्झर बन बहती शराब 
बहती करती मदमस्त 
राम नाम की सरिता
पावन स्त्रोत सरिता का
रमण कर लो तन मन संग
रमने दो चित राममय सरिता 
चित रम गया मेरे राम वही 
मेरे उद्धारक वही
नाम राम 
प्रतीक बना परमात्मा 
प्रेम रस दरिया हुआ 
आज राममय
राम नवमी तो एक स्तंभ बना
मेरे राम भगवान का
छगन लाल गर्ग