Friday, June 3, 2016

शरीर ओर आत्मा

नहीं आवश्यकता 
संसाधन सुख सत्य ज्ञानी 
जब जानता यथार्थ बोध
शरीर ओर आत्मा का
स्थूल सूक्ष्म अंतर
बोध करता तब विश्लेषण 
अंतिम आग्रह संक्रमण का
जब दोनों आभासित बीच 
शास्वत की महत्ता तोलनी होती
बड़ा भीषण वेदना क्षण 
माया मोह जब टूटने लगता
रंगीन काँच की तरह विखंडन 
मन काँपने लग जाता 
शून्य हुआ सा अस्तित्व हीन 
मन शरीर संग शोभित 
जीवन रंगों मे ही रहता साथ 
टूट जाते राग संबंध शरीर से
चेतन सजग हुआ जाता आत्मा की ओर
तो निश्चित यही स्वीकार ज्ञानी 
आत्मलीन रहता नित शरीर से दूर
बहुत फासले 
कारण मात्र यही नहीं रहती 
आवश्यकता संसाधन सुख
छगन लाल गर्ग