नहीं आवश्यकता
संसाधन सुख सत्य ज्ञानी
जब जानता यथार्थ बोध
शरीर ओर आत्मा का
स्थूल सूक्ष्म अंतर
बोध करता तब विश्लेषण
अंतिम आग्रह संक्रमण का
जब दोनों आभासित बीच
शास्वत की महत्ता तोलनी होती
बड़ा भीषण वेदना क्षण
माया मोह जब टूटने लगता
रंगीन काँच की तरह विखंडन
मन काँपने लग जाता
शून्य हुआ सा अस्तित्व हीन
मन शरीर संग शोभित
जीवन रंगों मे ही रहता साथ
टूट जाते राग संबंध शरीर से
चेतन सजग हुआ जाता आत्मा की ओर
तो निश्चित यही स्वीकार ज्ञानी
आत्मलीन रहता नित शरीर से दूर
बहुत फासले
कारण मात्र यही नहीं रहती
आवश्यकता संसाधन सुख ।
छगन लाल गर्ग ।
संसाधन सुख सत्य ज्ञानी
जब जानता यथार्थ बोध
शरीर ओर आत्मा का
स्थूल सूक्ष्म अंतर
बोध करता तब विश्लेषण
अंतिम आग्रह संक्रमण का
जब दोनों आभासित बीच
शास्वत की महत्ता तोलनी होती
बड़ा भीषण वेदना क्षण
माया मोह जब टूटने लगता
रंगीन काँच की तरह विखंडन
मन काँपने लग जाता
शून्य हुआ सा अस्तित्व हीन
मन शरीर संग शोभित
जीवन रंगों मे ही रहता साथ
टूट जाते राग संबंध शरीर से
चेतन सजग हुआ जाता आत्मा की ओर
तो निश्चित यही स्वीकार ज्ञानी
आत्मलीन रहता नित शरीर से दूर
बहुत फासले
कारण मात्र यही नहीं रहती
आवश्यकता संसाधन सुख ।
छगन लाल गर्ग ।