वहीं हुआ आखिर
जो कभी नहीं चाहा
मानव की श्रेष्ठता का शास्त्रीय उद्घोष
हर बार गरिमा देता
मानव होने का दंभ मानव कसौटी बने
आचरण उतरे
यही प्रयास अभाव भरी दशा भी
करता रहा जीता रहा
प्रकृति का नश्वर आकार अब
मेरा उतरार्द्ध बना
बचना चाहा हर कोशिश
पर पदार्थ गति शरीर भी
ऊर्जा खोता जाता प्रतिपल
ओर साथ ही रिश्तों का सार
बदलने लगता करवट
अपनत्व का ऊपरी आवरण
तपन की प्रखर उष्मा जलता रहा
निराकार निशब्द नीरव
जख्म उघडते रहे दुर्गंध भरे
मुँह मोडते रिश्ते
अब उजागर होते जाते साफ़ साफ़
मतलब की मलाई से शून्य
अपनत्व नही जीता लंबी उम्र
हर रिश्ते का सच
अभी उघडे जख्म की तरह
कि नहीं रहा मतलब का
अदृश्य आवरण
ओर झलकने लगा विभत्स सत्य
दुर्गति नहीं चाहता
यह बेबाक सत्य मुडता जाता
उसी ओर जहाँ बनी रिक्तता
भावनाओं ओर रिश्तों का सच
जानकर
अनजान सूनेपन के गर्त बहती
मानव मन की संवेदना
ओर मानव केवल शक्ल बचाता
जीता हर पल
बदलता जाता पशुओं की प्रवृत्ति में
क्या युग का यही सच
मानव की सभ्यता का कारण तो नहीं
संचय अनुतरित जवाब चाहता ।
छगन लाल गर्ग
जो कभी नहीं चाहा
मानव की श्रेष्ठता का शास्त्रीय उद्घोष
हर बार गरिमा देता
मानव होने का दंभ मानव कसौटी बने
आचरण उतरे
यही प्रयास अभाव भरी दशा भी
करता रहा जीता रहा
प्रकृति का नश्वर आकार अब
मेरा उतरार्द्ध बना
बचना चाहा हर कोशिश
पर पदार्थ गति शरीर भी
ऊर्जा खोता जाता प्रतिपल
ओर साथ ही रिश्तों का सार
बदलने लगता करवट
अपनत्व का ऊपरी आवरण
तपन की प्रखर उष्मा जलता रहा
निराकार निशब्द नीरव
जख्म उघडते रहे दुर्गंध भरे
मुँह मोडते रिश्ते
अब उजागर होते जाते साफ़ साफ़
मतलब की मलाई से शून्य
अपनत्व नही जीता लंबी उम्र
हर रिश्ते का सच
अभी उघडे जख्म की तरह
कि नहीं रहा मतलब का
अदृश्य आवरण
ओर झलकने लगा विभत्स सत्य
दुर्गति नहीं चाहता
यह बेबाक सत्य मुडता जाता
उसी ओर जहाँ बनी रिक्तता
भावनाओं ओर रिश्तों का सच
जानकर
अनजान सूनेपन के गर्त बहती
मानव मन की संवेदना
ओर मानव केवल शक्ल बचाता
जीता हर पल
बदलता जाता पशुओं की प्रवृत्ति में
क्या युग का यही सच
मानव की सभ्यता का कारण तो नहीं
संचय अनुतरित जवाब चाहता ।
छगन लाल गर्ग