प्राइवेट स्कूलों के
खानदानी विद्यार्थी आज
गंदी गलियों की रौनक बने
अंबेडकर जयंती पर
सौभाग्य बढ़ाते गलियों की
आ गये संकरी गली तक
तख्तियों से चेहरा ढके
नीची गरदनो की कतार
बढ़ी चली आयी
गली के अंतिम छोर
ओर अध्यापक गण
महकते रूमालों से नाशिका छुपाते
लंबे कदमों चलते आते आगे
नहीं समझ पाया अंदुरनी विवशता
आगे पतली गली निकलती
जहाँ भीड़ को रूकना होता
ओर वहीं होता जो होता आया
आज तक
संकरे रास्तों के प्रबुद्ध सक्षम
ईश्वरीय प्रतिनिधि
रोक देते शोषित उपेक्षितों को
नहीं पात्रता मनुष्य की
रोकते आम को ना बढ़ सके आगे
ऊँचाई का जन्मजात हक
केवल शास्त्र संम्मत
विधिक व्यवस्था स्वर्ण की
उसी में निहित
मंजिल पहुँच का अधिकार
केवल समर्थ सक्षम का
ओर यहीं होता
संविधान रचियता अंबेडकर
हमसे विश्वासघात कर गये
दे गये अधिकार कुजात आरक्षण
पर हम समर्थ सक्षम कूटनीतिज्ञ
बन रहा अब माहौल
ऊबाऊ इंतजार से घबराकर
जीने के लिए माँगते रहे भीख
बराबरी की
आश्वासन का मीठा घूँट
मिलता रहे
अनिश्चित बारी का भय
रूग्ण करता रहे उम्मीदें
दशा यही जीता रहें दलित
ओर अब होने दो आंदोलन
आये हर समुदाय मांगने हक
आरक्षण नौकरियों का
रहे संकरी गली भी हमारी
इंतजार घेर लेगी मौत
योग्य राहगीर केवल हम
ओर दलित
युग का घृणित सत्य
अंबेडकर रेली का सच
कोलाहल का प्रदर्शन
लगता जैसे सूट बूट पहने सताधीश
सवेरे की बांग देते लगते
ऊँचे महलों बसे मुर्गों की तरह ।
छगन लाल गर्ग ।
खानदानी विद्यार्थी आज
गंदी गलियों की रौनक बने
अंबेडकर जयंती पर
सौभाग्य बढ़ाते गलियों की
आ गये संकरी गली तक
तख्तियों से चेहरा ढके
नीची गरदनो की कतार
बढ़ी चली आयी
गली के अंतिम छोर
ओर अध्यापक गण
महकते रूमालों से नाशिका छुपाते
लंबे कदमों चलते आते आगे
नहीं समझ पाया अंदुरनी विवशता
आगे पतली गली निकलती
जहाँ भीड़ को रूकना होता
ओर वहीं होता जो होता आया
आज तक
संकरे रास्तों के प्रबुद्ध सक्षम
ईश्वरीय प्रतिनिधि
रोक देते शोषित उपेक्षितों को
नहीं पात्रता मनुष्य की
रोकते आम को ना बढ़ सके आगे
ऊँचाई का जन्मजात हक
केवल शास्त्र संम्मत
विधिक व्यवस्था स्वर्ण की
उसी में निहित
मंजिल पहुँच का अधिकार
केवल समर्थ सक्षम का
ओर यहीं होता
संविधान रचियता अंबेडकर
हमसे विश्वासघात कर गये
दे गये अधिकार कुजात आरक्षण
पर हम समर्थ सक्षम कूटनीतिज्ञ
बन रहा अब माहौल
ऊबाऊ इंतजार से घबराकर
जीने के लिए माँगते रहे भीख
बराबरी की
आश्वासन का मीठा घूँट
मिलता रहे
अनिश्चित बारी का भय
रूग्ण करता रहे उम्मीदें
दशा यही जीता रहें दलित
ओर अब होने दो आंदोलन
आये हर समुदाय मांगने हक
आरक्षण नौकरियों का
रहे संकरी गली भी हमारी
इंतजार घेर लेगी मौत
योग्य राहगीर केवल हम
ओर दलित
युग का घृणित सत्य
अंबेडकर रेली का सच
कोलाहल का प्रदर्शन
लगता जैसे सूट बूट पहने सताधीश
सवेरे की बांग देते लगते
ऊँचे महलों बसे मुर्गों की तरह ।
छगन लाल गर्ग ।