नाम तो हो
शेष्टाओ का सिलसिला
अबाध चलता
कला हैं भरपूर
आजमाता रहता हूँ
क्या हुआ योग्यता नहीं पायी
दाव पेच का पिटारा
सहज खरीदता हूँ
कुछ अपने भी
गेरो की तरह मुझसे ही
श्वास लेते हैं
थोड़ा सा फरेबी नमन
प्रतिष्ठो से
मुझे बहुत रूचता हैं
छाया तले कारवाँ मेरा
खुद के झंडे नीचे
भीड़ का चलता रहता हैं
यह दर्जा
नाम भी काम भी
बेखटके देता रहता हैं
जिन्दगी का यह सत्य
विवेक से नहीं
मेरे झंडे तले
बिकता हैं सुंदर व टिकाऊ।
छगन लाल गर्ग।
शेष्टाओ का सिलसिला
अबाध चलता
कला हैं भरपूर
आजमाता रहता हूँ
क्या हुआ योग्यता नहीं पायी
दाव पेच का पिटारा
सहज खरीदता हूँ
कुछ अपने भी
गेरो की तरह मुझसे ही
श्वास लेते हैं
थोड़ा सा फरेबी नमन
प्रतिष्ठो से
मुझे बहुत रूचता हैं
छाया तले कारवाँ मेरा
खुद के झंडे नीचे
भीड़ का चलता रहता हैं
यह दर्जा
नाम भी काम भी
बेखटके देता रहता हैं
जिन्दगी का यह सत्य
विवेक से नहीं
मेरे झंडे तले
बिकता हैं सुंदर व टिकाऊ।
छगन लाल गर्ग।