दीप हैं यह
रश्मिया बिखरेता पुण्ज
रीत रीत जलता रहा निरन्तर
यह जलना उसका वेदनामय जीवन का सार
हर पल का प्रज्वलन हर पल वेदना की कसक हैं
जो झेलना उसकी नियति
राग की लौ का कंचन हैं
करता जाता विसर्जित अपना तन अपना नेह
जलता हैं नित
दीप हैं यह
यह मन मंदिर का विकल संताप
झेले अर्पित हुआ अपने आराध्य को
मिट मिट जाता
ओर दे रहा संदेश अर्पण का
समूचा अस्तित्व लिए
आराध्य की साधना मे
जलने दो इसे
दीप हैं यह
नीरवता पहचान हैं इसकी
एक राग जलने दो
प्राण समा जाने दो प्रियतम मे
लगने दो जलने दो इसकी पूरी प्रतिमा
सामर्थ्य तेज चेतना को
यह दीप हैं मन मंदिर का
एकलय जलता हैं जलने दो
तुम मत डालो बाधा
झंझावत बनकर
डोलता हैं दीप स्वयं को बचाने
जानो तो उसका बचना मात्र स्व हित कहां
निमित्त बना मात्र रोशनी
जलना मिटना अस्तित्व खोना तो
इसकी साधना हैं
तुम्हारी बाधा हैं मात्र
अंधकार बचाने की
कि यह रोशनी रूक जाय
पर यह दीप मन मंदिर का
प्राण विराग राग प्रज्वलन चाहते
मत रोको इसे जलने दो
मंदिर का दीप हैं यह
कब बूझे हैं दीये
तुम्हारी चेष्टाओ से
भयभीत तुम
जलना इसका मौत तुम्हारी
ओर यह ठीक होगा
कि तुम मरो कि चेतना के दीये जले
सम्पूर्णता के साथ
कि जग हो सके रोशन
प्रखर गति शील
ओर जलते जलते जी सके
मंदिर मंदिर
घर घर आराध्य के नाम
दे सके ओरो के प्राणों मे ऊर्जा
जमा अंधकार मिटाने की
तुम भ्रमित सा मत करो जग
तुम्हारा रहना बचना नारकीय दुख हैं
अंधकार मेरे अब छोड़ो प्रयास
आज घर घर दीप प्रज्वलित हैं
हर मन मंदिर चेतन दीप जल उठे हैं
कहां कहां बुझाओगे तुम
यह चेतना जगी जली हैं
जगने दो
मंदिर का दीप हैं यह
नीरव नीरव जलने दो।
छगन लाल गर्ग।
रश्मिया बिखरेता पुण्ज
रीत रीत जलता रहा निरन्तर
यह जलना उसका वेदनामय जीवन का सार
हर पल का प्रज्वलन हर पल वेदना की कसक हैं
जो झेलना उसकी नियति
राग की लौ का कंचन हैं
करता जाता विसर्जित अपना तन अपना नेह
जलता हैं नित
दीप हैं यह
यह मन मंदिर का विकल संताप
झेले अर्पित हुआ अपने आराध्य को
मिट मिट जाता
ओर दे रहा संदेश अर्पण का
समूचा अस्तित्व लिए
आराध्य की साधना मे
जलने दो इसे
दीप हैं यह
नीरवता पहचान हैं इसकी
एक राग जलने दो
प्राण समा जाने दो प्रियतम मे
लगने दो जलने दो इसकी पूरी प्रतिमा
सामर्थ्य तेज चेतना को
यह दीप हैं मन मंदिर का
एकलय जलता हैं जलने दो
तुम मत डालो बाधा
झंझावत बनकर
डोलता हैं दीप स्वयं को बचाने
जानो तो उसका बचना मात्र स्व हित कहां
निमित्त बना मात्र रोशनी
जलना मिटना अस्तित्व खोना तो
इसकी साधना हैं
तुम्हारी बाधा हैं मात्र
अंधकार बचाने की
कि यह रोशनी रूक जाय
पर यह दीप मन मंदिर का
प्राण विराग राग प्रज्वलन चाहते
मत रोको इसे जलने दो
मंदिर का दीप हैं यह
कब बूझे हैं दीये
तुम्हारी चेष्टाओ से
भयभीत तुम
जलना इसका मौत तुम्हारी
ओर यह ठीक होगा
कि तुम मरो कि चेतना के दीये जले
सम्पूर्णता के साथ
कि जग हो सके रोशन
प्रखर गति शील
ओर जलते जलते जी सके
मंदिर मंदिर
घर घर आराध्य के नाम
दे सके ओरो के प्राणों मे ऊर्जा
जमा अंधकार मिटाने की
तुम भ्रमित सा मत करो जग
तुम्हारा रहना बचना नारकीय दुख हैं
अंधकार मेरे अब छोड़ो प्रयास
आज घर घर दीप प्रज्वलित हैं
हर मन मंदिर चेतन दीप जल उठे हैं
कहां कहां बुझाओगे तुम
यह चेतना जगी जली हैं
जगने दो
मंदिर का दीप हैं यह
नीरव नीरव जलने दो।
छगन लाल गर्ग।