Thursday, June 9, 2016

सीलन

सीलन बढी हैं
भीतर ओर बाहर
ढूंढता हूँ तपन ऊर्जा की
नहीं उम्मीद
सर्द झौकों से
कंपन लाते चिरते जाते
तन ओर मन
कर चुका प्रबंध पूरे
बसने के
गर्म कपडों से ढकता जाता
बाह्य आकार तन का
श्वास खाते नथूने
चाहते हवा जिंदगी की
ठंडी ही सही
ठिठुरी जिंदगी के तपन की आस
बिना भीतरी ऊर्जा
रहते नही आती
ओर हम लालायित हुए
जीने लगे
ओरों की आस
चेतना का कोष रीतता जाता
बिना महसूस किये
प्रगाढ सत्य
भीतरी जहां स्त्रोत ऊर्जा
चाहता बहना
स्थूल भोतिक चमक 
मोटी दीवार बनी
रोकती 
देती तृष्णा का मोह
ओर यह जीवन
ठिठुरन झेलता
बढता जाता
जडता की विश्रान्ति की चाह।

छगन लाल गर्ग