Thursday, June 9, 2016

अतीत

देख चुका अतीत 
अति समृद्ध मित्र का
दबदबा अहंमन्यता
अति झेलता विगत 
नहीं रहा
झुर्रियाँ छायी बिगाड़ चुकी
तेजस्विता भरा व्यक्तित्व
नहीं हुआ जाता स्वतः खड़े भी
आया हूँ झिझक लिए
नही चाहता 
छिड़ जाय बातों मे अतीत 
संभलता लेता हूँ समाचार 
तबीयत का बच्चों का
उदासी का घनत्व छितरा चेहरा 
सब कहता जाता 
बीमारी मात्र यही
नहीं लेते टोह अपने 
एक अनचाही वस्तु सा
उपेक्षित पडा हैं व्यक्तित्व
देखता हूँ 
नौकरी वाला पुत्र 
आते ही बाप को 
दोनों हाथ जोडते
याचना उकेरे शब्दों मे
कि लेता आये शाम लौटे 
खान्शी की दवाइयाँ 
मैं निहारने लगता हूँ सूर्य 
दौपहरी चढ़ा 
तीक्षण किरणे छेदती जाती
भीतर का ठोस धरातल
पिघलता द्रव्य बहना चाहता
पसीना बना
बेबूझ स्वर स्वर कहता
उठता हूँ 
धूप गहरी हैं खाट छाये मे ले लो
देखता हूँ 
नहीं होती प्रतिक्रिया 
आवाज गहरे अनंत डूबी
लौटती बनती जाती
बार बार मेरे कानों की ध्वनि 
लगता हैं अस्तित्व 
खो चुके शून्य हुए
हम दोनों
छगन लाल गर्ग।