Thursday, June 9, 2016

तन्हाई

हर तन्हाई
कसोटती जीगर
हटता जाता आवरण 
असत्य भरा
निखरने लगता चित
पूर्ण पावन मर्म पाया अपनत्व
विवेक की तराजू
तुलता जाता संसर्ग का हर पल
जिसे अतीत जीया
खिलते रहे कामनाऔ के कुसुम
भावना भरे
हर क्षण का कतरा
देता रहा जीवन के अर्थ
शास्वत राग उभरता
कहता जाता
स्वयं की कमजोरियों का हिसाब
अधिक संताप देती
हर घडी जुदाई
अपनी क्षणिक उन्माद मे
गुजारी कारगुजारियों की कलुषता
भरभरा उठता हृदय
तन्हाई यों के विराने से
नजाकत के हर पल
दे जाते
विमलता भरी सीख
विरह का हर दर्द भरा
मांजने लगता
व्यक्ति त्व का भीतरी सत्य
यही कारण जीवन का
विरह बन जाता चेतना
जहां परिमल नेह
लेता रहता विस्तार
ओर यही से अंकुर पाता
निश्छल नेह
बनता प्रार्थना का राग
कहीं दूर
शायद अनंत से निर्मलता लिए
पुकार गूंजती
भीतरी संवेदना की
तब नहीं बसता मैं
हो जाता हूँ विलय
अचेतन शून्य में।
छगन लाल गर्ग।