बना दिया संबंध
अति आत्मिय
अपनी गरज
रखता जाता
गोपनीय
नहीं देता पहचान
भीतर छीपे स्वार्थ की
देखो ना
बहुत दिखता
परमार्थी संवेदना भरा
ओर करता जाता
इंतजार क्षण की
जहां जीत सकू
विश्वास का आखिरी छोर
ओर फिर देता झटका
मित्र की आस्था को
ताकि पा जाऊ
अपना मकसद
अब क्या कहूं
प्रगति करना आज
निर्भर करता
इसी पर कि
कि हम
होनहारी का अभिनय
कौशल
हृदय हीन हुए
अंगीकृत कर सभ्य
बने कितने
मापक समृद्धि यही
इस युग की।
छगन लाल गर्ग।
अति आत्मिय
अपनी गरज
रखता जाता
गोपनीय
नहीं देता पहचान
भीतर छीपे स्वार्थ की
देखो ना
बहुत दिखता
परमार्थी संवेदना भरा
ओर करता जाता
इंतजार क्षण की
जहां जीत सकू
विश्वास का आखिरी छोर
ओर फिर देता झटका
मित्र की आस्था को
ताकि पा जाऊ
अपना मकसद
अब क्या कहूं
प्रगति करना आज
निर्भर करता
इसी पर कि
कि हम
होनहारी का अभिनय
कौशल
हृदय हीन हुए
अंगीकृत कर सभ्य
बने कितने
मापक समृद्धि यही
इस युग की।
छगन लाल गर्ग।