Wednesday, June 8, 2016

छैल निर्झर

छैल नही होते 
निर्झर 
कण कण जुडती 
कठोरता 
ओर पाती पराकाष्ठा 
शुष्कता बन जाती
कडा आवरण
बाहर का भी
भीतरी भी
नही जीवंतता कि बहे
कही सरस धार
सोखती जाती नमी
अवशेष रहे
स्नेह नीर की
ओर देती विशालता
अपना वर्चस्व
मरता जाता बहाव स्त्रोत
रात दिन
व्याप्त करने
व्यापक विडंबना जीवन
निर्मित होता जाता
आवरण मोटापा कठोर
अहंकार का
विशालकाय विष वृक्ष
उगलता असीम विष
अस्तित्व उखाडता जहर
जिससे वातावरण बन चुका
विषाणु युक्त
हर बहता स्नेह स्त्रोत
जीवन भरा
सोखता जाता
यह विषभरा रेगिस्तान
क्या हो
सभ्य सर्प बन चुका पाषाण
हौशियारी की
औषधि नही आती काम
धरातलीय तपन बन उष्मा
मेघ बनना
आखिरी औषधि
तडाग की
तडक बन तौड ना होगा
अहंकार
ओर मेघ बन बनाना होगा
बाढ धरा को
समरसता सरलता
सरसता मात्र
चाहती यही राह
जीवन निर्झर प्रवाह का ।
छगन लाल गर्ग ।