Wednesday, June 8, 2016

यथार्थ जीवंत

यह नहीं केवल 
अनुभूति 
यथार्थ जीवंत 
साक्षात भोगा
नामकरण संभव नहीं 
अभिव्यक्ति हो सके
तो काफी
आ रहा वह
बोझा उठाये
विशालकाय शरीर
पर ठहरा सा झुका झुका
कंधों पर विधमान
दो कट्टे शायद अंतिम बोझ
मुंडेर पर नजरें उठते ही
मिलती हैं नजरें मुझसे
जहाँ नित की तरह
बैठा हूँ मैं
सरकते कदमों आता मेरी ओर
बैठता कहता राम राम बाबू जी
मुस्कान लेते
पूछने लगता हालचाल उसका
देखता दोनों पैरों की ओर
घुटनों तक सूजन
नीचे पैरो की
उँगलियाँ फटने को ऊतारू
पूछता यह क्या भाई
हुआ क्या
मौन चेहरे पर
छलकती आँसू भरी आँखें
अस्फूट स्वर नहीं पता बाबूजी
भीग जाता हूँ मैं
वेदना के
कडवे धुएँ निर्मित आँसुओं से
आह जीवन
गजब हैं तेरी कहानी
निराधार बेसहारा भी
क्या जीते हैं मानव की तरह
फिर हमारे विद्वानों ने
क्यों नहीं दिया नाम
मानव नहीं दानव नहीं
याचक ही सही
कैसे कहूँ कि
तुम मानव होते भी
मानव के पात्र नहीं
यह लाचारी
यह दशा तुमसे नहीं
मानवीय गिरावट का
बिम्ब बनी
मुँह चिढाती हमारा
उठता हूँ पास से
बिस्किट लाकर देता हूँ
टटोलता हूँ अपने को
मानव बनने के उधोग मे
सूनापन गहरा घना होता
कहीं दूर से प्रतीति होती
करूण आवाज
चलता हूँ बाबूजी
जहाँ तक चल सकूँ
यह भार लिए
निष्प्राण निष्क्रिय अचेतन
अस्तित्व महसूस करता
उठता हूँ
जीने के लिए ।
छगन लाल गर्ग ।