Sunday, June 12, 2016

सत्य दोहराता

अटका हुआ स्तंभित 
ग्रंथि की गहनता बीच 
अवलोकित सत्य दोहराता सा
चेतना की विश्रृखल विवेक गुत्थियो
को सुलझाने के प्रयास मे
स्वयं उलझा उलझा विवश
हर विचार धागे की सलवट सरल
सीधी होते होते
फिर फिर उलझ जाती हैं
विवेक दंभी व्यक्तित्व आधे अधूरे को
अटल सत्य जान ढिढोरा पिटता जाता
सत्य साक्षात्कार का
बड़ा अजीब हूँ
शायद मनुष्य भी पर अलौकिक भी
निश्चय कर चुका हूँ
रहस्य भेदन का
निकल पडा हूँ सत्य की परतो को
उखाड़ उखाड़ संश्लेषण करता
फिर विश्लेषण देता रहता हूँ
मीठे रसीले शब्दों मे परोसता हुआ
कभी भरता रंग ईश्वरीय पोस्टर के संगीत मय
फिर लिखता जाता हूँ विवेक निर्मित
आध्यात्मिक विचारों का शब्द कंचन हार
ओर पहनाता जाता हर पोस्टर के गले
गल हार बनाकर
बन जाता हूँ भक्त शिरोमणि
अवतारी प्रबुद्ध ओर पंडित
स्तम्भित हूँ अटका हूँ
सोचता जाता
आत्म अवलोकन करता पाता हूँ
मुझसे अधिक नजदीक
अनपढ सीधे साधे देहाती
हर पल पीड़ा झेलते लोग
उस परमात्मा को अधिक जानते हैं
कम फासला उनका परमात्मा तक पहुँच का
ओर मैं अटका स्तम्भित
शास्त्रो ओर सिद्धांतो की भूल भूलैया
का साक्षी मात्र हूँ ।
छगन लाल गर्ग।