यह पराकाष्ठा हैं
नेह के इकरार की
जहां मात्र गुंजाइश रहती
सत्य की
भावनाओ का आवेग
बाढ़ सा आवेग देता
भरता हैं जीवन की रिक्तता
ओर प्रति पल बनता जाता
स्वर्णिम सुवासित
बढ़ जाती हैं कीमत
उकेरे हुए शब्दों की
हर शब्द बनता जाता नगिना
पिरोया जाता हैं भावनाओ की
माला मे
ओर पहना जाता दिल के उपर
शब्दों का अलौकिक हार
कहां हैं अंहकार
निर्मल चित बन जाता
परमात्मा की प्रार्थना सा
यहाँ मैं कहां हम होते हैं
ओर यह हम बन जाता चेतन
सक्रिय हर पल
पराकाष्ठा हैं यह
ओर हर पराकाष्ठा
आवेग बीज सृजित होती हैं
अस्थाई भाव की तरह
जिसका पतन ही सार हैं
कास।आवेग प्रेम न होता
जिन्दगी जीने लायक होती।
छगन लाल गर्ग।
नेह के इकरार की
जहां मात्र गुंजाइश रहती
सत्य की
भावनाओ का आवेग
बाढ़ सा आवेग देता
भरता हैं जीवन की रिक्तता
ओर प्रति पल बनता जाता
स्वर्णिम सुवासित
बढ़ जाती हैं कीमत
उकेरे हुए शब्दों की
हर शब्द बनता जाता नगिना
पिरोया जाता हैं भावनाओ की
माला मे
ओर पहना जाता दिल के उपर
शब्दों का अलौकिक हार
कहां हैं अंहकार
निर्मल चित बन जाता
परमात्मा की प्रार्थना सा
यहाँ मैं कहां हम होते हैं
ओर यह हम बन जाता चेतन
सक्रिय हर पल
पराकाष्ठा हैं यह
ओर हर पराकाष्ठा
आवेग बीज सृजित होती हैं
अस्थाई भाव की तरह
जिसका पतन ही सार हैं
कास।आवेग प्रेम न होता
जिन्दगी जीने लायक होती।
छगन लाल गर्ग।