Monday, June 13, 2016

बस करो ना

बस करो ना
हर बार मेरा बखान 
अब रात भी क्या 
सौन्दर्य भरती हैं 
प्रेम देती हैं 
कैसे हो तुम 
मैं ही मिली क्या तुम्हें 
अभागे
चाँदनी रही कहां 
कि मेरे ऑचल के मोती
तुम्हारे जमीन की रोशनी से
रोशन हैं 
कि शीतल हैं 
चकाचौंध दुनिया तुम्हारी
कहीं बेहतर 
लुभाती तुम्हें 
मेरा सौन्दर्य अब
बेकारो का बकवास 
रहा हैं 
सच कहो
किताबी तारिफ से जुदा
कब निहारा तुमने मुझे 
कि तुम्हारे प्राणों की रश्मिया
मेरा तम चिरती सी
पहुँची हो मेरे प्राणो तक
असली सौन्दर्य 
कहां देखते तुम 
तुम्हारे विशाल जग की
तमाम कालिमा समेटे
जीती मे
कि तुम नयी उर्जा लिए
फिर फिर 
चेतना लिए जी सको
एक तुम हो
हर बार की तरह
बनावट लिपटी
अंलकारिक तारिफ किए जाते हो
भर गया हैं मन अब
बस करो ना।
छगन लाल गर्ग।