Monday, June 13, 2016

महक बाकी हैं

महक बाकी हैं 
मुरझाये अरमान हैं कहां 
कि विश्राम हो
स्वाभाविक प्रवृत्ति गति देती हैं 
ओर कदम 
शिथिल ही सही 
बढते हैं 
पाने तुझे जो अन छुआ 
हुआ कहीं खोया हैं 
घनी भीड़ बीच 
बहु रंग लिए बेबूझ हो
विचरते रहे हो
देखता हूँ तुम्हें औझल होते
शब्दों के बीच 
मुस्कान की परतो तले
बनावटी हँसी बीच 
चेहरे के रंग रोगन तले
ओर उधार की शानोशौकत बीच 
छिपते बहुत हो तुम 
पारखी हैं नजर मेरी 
कहां हुई दोस्ती अपनी 
कि हो सकू 
सर्व गुण सम्पन्न तुम्हारे सा
अकेले ही सही 
जीवन महक अभी बाकी हैं 
उग्र हो महक
पर सत्य हैं 
ओर सुरभि मंद मंद ही
भाती हैं 
आनन्द सार वहीं हैं
छगन लाल गर्ग।