महक बाकी हैं
मुरझाये अरमान हैं कहां
कि विश्राम हो
स्वाभाविक प्रवृत्ति गति देती हैं
ओर कदम
शिथिल ही सही
बढते हैं
पाने तुझे जो अन छुआ
हुआ कहीं खोया हैं
घनी भीड़ बीच
बहु रंग लिए बेबूझ हो
विचरते रहे हो
देखता हूँ तुम्हें औझल होते
शब्दों के बीच
मुस्कान की परतो तले
बनावटी हँसी बीच
चेहरे के रंग रोगन तले
ओर उधार की शानोशौकत बीच
छिपते बहुत हो तुम
पारखी हैं नजर मेरी
कहां हुई दोस्ती अपनी
कि हो सकू
सर्व गुण सम्पन्न तुम्हारे सा
अकेले ही सही
जीवन महक अभी बाकी हैं
उग्र न हो महक
पर सत्य हैं
ओर सुरभि मंद मंद ही
भाती हैं
आनन्द सार वहीं हैं ।
छगन लाल गर्ग।
मुरझाये अरमान हैं कहां
कि विश्राम हो
स्वाभाविक प्रवृत्ति गति देती हैं
ओर कदम
शिथिल ही सही
बढते हैं
पाने तुझे जो अन छुआ
हुआ कहीं खोया हैं
घनी भीड़ बीच
बहु रंग लिए बेबूझ हो
विचरते रहे हो
देखता हूँ तुम्हें औझल होते
शब्दों के बीच
मुस्कान की परतो तले
बनावटी हँसी बीच
चेहरे के रंग रोगन तले
ओर उधार की शानोशौकत बीच
छिपते बहुत हो तुम
पारखी हैं नजर मेरी
कहां हुई दोस्ती अपनी
कि हो सकू
सर्व गुण सम्पन्न तुम्हारे सा
अकेले ही सही
जीवन महक अभी बाकी हैं
उग्र न हो महक
पर सत्य हैं
ओर सुरभि मंद मंद ही
भाती हैं
आनन्द सार वहीं हैं ।
छगन लाल गर्ग।