रहती हैं निष्पतिया
अकर्मण्य कर्मो मे
जीना होता बेमन
असमझ की जिन्दगी
विवशता हैं हमारी
विभ्रान्ति की राहे
अधूरी तलाश मे जोडती हैं
जिन्दगी
हाथ रह जाते खाली खाली
दिखती हैं केवल
निष्पति से अंगीकृत अस्तित्व
यह सच जीवन का
कि मंजिल दिखती जाती
पर राह तलाश रह रह जाती
घनेरे प्रयास भी बाकी
अंजाम जिन्दगी हमारी
जीती जाती निष्पति भरा संसार
भटकावो की राहे
बाहे फैलाये
करती जाती आशक्त
ओर मैं भटक जाता
तृष्णाओ की अंतहीन राहो मे
जहां बहुतेरे साथी
हमदर्दी की आवाज देते
बुलाते हैं
अबोध राही सा बढता जाता हूँ
नित नयी उलझनों के रास्ते
असमझ ही जीता हूँ जिन्दगी तुझे
उपलब्धियो के नाम
जीवन पिटारे मे
रहती हैं निष्पतिया ।
छगन लाल गर्ग ।
अकर्मण्य कर्मो मे
जीना होता बेमन
असमझ की जिन्दगी
विवशता हैं हमारी
विभ्रान्ति की राहे
अधूरी तलाश मे जोडती हैं
जिन्दगी
हाथ रह जाते खाली खाली
दिखती हैं केवल
निष्पति से अंगीकृत अस्तित्व
यह सच जीवन का
कि मंजिल दिखती जाती
पर राह तलाश रह रह जाती
घनेरे प्रयास भी बाकी
अंजाम जिन्दगी हमारी
जीती जाती निष्पति भरा संसार
भटकावो की राहे
बाहे फैलाये
करती जाती आशक्त
ओर मैं भटक जाता
तृष्णाओ की अंतहीन राहो मे
जहां बहुतेरे साथी
हमदर्दी की आवाज देते
बुलाते हैं
अबोध राही सा बढता जाता हूँ
नित नयी उलझनों के रास्ते
असमझ ही जीता हूँ जिन्दगी तुझे
उपलब्धियो के नाम
जीवन पिटारे मे
रहती हैं निष्पतिया ।
छगन लाल गर्ग ।