Friday, June 3, 2016

छाये बादल

छाये बादल 
अविश्वास घृणा 
मानवता बीच 
अधिक क्षमता का अहंकार 
बन चुका विचारो का धुँआ 
जात पात की ऊंचाई 
धर्मों का पाखण्ड 
बनता जाता 
कट्टरता चक्रवात 
धुंधला हुआ जाता नभ
एक समान 
धरती आकाश 
ढक दिया आज सूरज 
रश्मियों को
तल से हिलोर लेते भंवर 
मिट्टी हवा मिल 
उतारू हुए 
भरने उडान ऊँचाईयों की
महत्ता दिखाते से
अपने सर्वश्रेष्ठ की
कालिमा का चेहरा उनका 
होता जाता 
उजागर ठीक रात की तरह
उठते हैं अंधड जीवन में
ठीक इसी तरह 
जख्मी कर जाते 
हौसले उडान के
घने अंधेरे 
नही सुझता राह
ओर 
गंदले इरादे लोलुप बन
बाधित करते सत्य 
अदृश्य रहा सत्य 
अहसास में
नित्य भरता 
चेतना की आस
हर अंधड निर्मित होता 
वासना की दुर्गंध से
कही बहुत गहरे 
स्नेह स्त्रोत 
तरल सा सत्य छिपता सा
विकसित होता
नवल प्रभात की रश्मियाँ लेकर
ओर हर उत्पात 
वासना जनित
लुप्त होकर खिलने लगते
जीवन के फूल 
विश्वास आस्था के 
संगम का
नवल प्रभात आने दोगे 
सवाल सवाल ना रह जाये
उत्तर पाये बिना
छगन लाल गर्ग